News Desk| कभी उत्तर भारत की गलियों में घूमना हो, वृंदावन की कचौड़ी वाली रेहड़ियों का स्वाद जरूर चखिएगा, क्योंकि इसके बिना आपका कचौड़ियों का स्वाद अधूरा रह जाएगा। जितना उमदा इसका स्वाद होता है उतना ही प्राचीन इसका इतिहास भी है।वृंदावन की कचोरी केवल एक पकवान नहीं, बल्कि ब्रज की सात्विक परंपरा और भक्ति का हिस्सा है। इसकी खासियत इसका शुद्ध शाकाहारी होना और “बिना लहसुन-प्याज” के भी अद्भुत स्वाद देना है।
वृंदावन की कचोरी का इतिहास और विशेषता
वृंदावन और मथुरा (ब्रज क्षेत्र) में कचोरी-जलेबी को पारंपरिक नाश्ता या ‘कलेऊ’ माना जाता है। यहाँ की कचोरी मुख्य रूप से बेड़ई (Bedai) के रूप में प्रसिद्ध है:
- बनावट और सामग्री: यह कचोरी गेहूं के आटे और उड़द दाल की पिट्ठी (स्टफिंग) से बनाई जाती है, जिसमें हींग, काली मिर्च और अदरक का भरपूर उपयोग होता है。
- बनाने का तरीका: इसे धीमी आंच पर देसी घी में तला जाता है, जिससे यह बहुत ही खस्ता (Flaky) बनती है。
- परोसने का अंदाज: इसे आमतौर पर ‘डुबकी वाले आलू’ (पतली रसेदार सब्जी), कद्दू की खट्टी-मीठी सब्जी और रायते के साथ परोसा जाता है。
- इसमें लहसुन और प्याज क्यों नहीं होता?
- वृंदावन भगवान श्री कृष्ण की नगरी है, और यहाँ का पूरा भोजन सात्विक सिद्धांतों पर आधारित है। इसके पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों कारण हैं:
- भगवान का भोग: वैष्णव परंपरा के अनुसार, भगवान कृष्ण को केवल सात्विक भोजन का ही भोग लगाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, लहसुन और प्याज को तामसिक (अशुद्ध) माना गया है, इसलिए इन्हें भगवान को अर्पित नहीं किया जा सकता|
- पौराणिक कथा: एक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान ‘स्वर्भानु’ नामक असुर ने छल से अमृत पी लिया था। भगवान द्वारा उसका सिर काटने पर अमृत की जो बूंदें उसके खून के साथ जमीन पर गिरीं, उनसे लहसुन और प्याज की उत्पत्ति हुई। अमृत के अंश के कारण इनमें औषधीय गुण तो हैं, लेकिन असुर के स्पर्श के कारण ये तामसिक माने जाते हैं|
- मानसिक शांति: आयुर्वेद और योग के अनुसार, लहसुन-प्याज मन में उत्तेजना, गुस्सा और अशांति पैदा करते हैं|
- GI टैग की तैयारी: मथुरा और वृंदावन के प्रसिद्ध ‘पेड़ा’ के साथ-साथ यहाँ के अन्य पारंपरिक व्यंजनों को Geographical Indication (GI) टैग दिलाने की प्रक्रिया चल रही है, जिससे इस कचोरी और अन्य पकवानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सकेगी।
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