वट सावित्री व्रत हिंदू संस्कृति में पति-पत्नी के अटूट प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। यह व्रत न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि यह भारतीय नारी की उस शक्ति को भी दर्शाता है जिसने अपनी बुद्धिमत्ता और तप से यमराज को भी झुकने पर मजबूर कर दिया था।
1. वट सावित्री व्रत 2026: मुख्य तिथियाँ
भारत के विभिन्न हिस्सों में यह व्रत दो अलग-अलग कैलेंडर के अनुसार मनाया जाता है:
- अमावस्या व्रत (उत्तर भारत): मुख्य रूप से यूपी, बिहार और दिल्ली में यह 16 मई 2026 को मनाया जाएगा।
- पूर्णिमा व्रत (महाराष्ट्र और गुजरात): यहाँ इसे ‘वट पूर्णिमा’ कहते हैं, जो 29 जून 2026 को मनाया जाएगा।
2. वट (बरगद) वृक्ष का आध्यात्मिक महत्व
शास्त्रों के अनुसार, वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में शिव का वास होता है। इसकी लंबी आयु और विशालता के कारण इसे अक्षय माना जाता है। महिलाएं इसकी पूजा इसलिए करती हैं ताकि उनका सुहाग भी इस वृक्ष की तरह स्थिर और दीर्घायु रहे।
3. पूजा की विस्तृत विधि
इस दिन की पूजा बहुत ही नियमबद्ध तरीके से की जाती है:
- श्रृंगार और संकल्प: सुहागिनें सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान करती हैं और लाल या पीली साड़ी पहनकर सोलह श्रृंगार करती हैं।
- वृक्ष पूजन: बरगद के वृक्ष के नीचे सावित्री-सत्यवान की प्रतिमा रखी जाती है। वृक्ष की जड़ में जल, दूध, अक्षत, और फूल अर्पित किए जाते हैं।
- परिक्रमा और धागा: सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा परिक्रमा है। महिलाएं वृक्ष के चारों ओर 7 या 108 बार घूमते हुए ‘कच्चा सूत’ (मौली) लपेटती हैं।
- बायना और आशीर्वाद: अंत में चने, फल और वस्त्र का ‘बायना’ (दान) सास या घर की बुजुर्ग महिलाओं को देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।
4. दक्षिण भारत की अनूठी परंपरा: करदइयान नोम्बू
दक्षिण भारत (विशेषकर तमिलनाडु) में इसे ‘करदइयान नोम्बू’ के नाम से जाना जाता है।
- क्यों और कब: यह तमिल महीने ‘मासी’ के संगम पर मनाया जाता है (मार्च के दौरान)।
- विशेष रीति: यहाँ महिलाएं बरगद के पेड़ के बजाय घर पर ही पूजा करती हैं। वे गले में एक ‘पीला पवित्र धागा’ बांधती हैं और ‘करदइ’ (चावल और लोबिया से बना पकवान) का भोग लगाती हैं।
5. व्रत के पीछे की पौराणिक कथा
यह व्रत देवी सावित्री की याद में रखा जाता है। जब यमराज उनके पति सत्यवान के प्राण ले गए, तो सावित्री तीन दिन तक उनके पीछे चलती रहीं। अपनी चतुराई और दृढ़ता से उन्होंने यमराज से तीन वरदान मांगे, जिसमें उन्होंने अपने पति के जीवित होने का वरदान भी प्राप्त कर लिया। वट वृक्ष की छाया में ही सत्यवान को पुनः जीवन मिला था, इसीलिए इस वृक्ष की पूजा का महत्व बढ़ गया।
6. सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
यह त्योहार महिलाओं को एक साथ आने, गीत गाने और परंपराओं को साझा करने का अवसर देता है। यह पर्यावरण के प्रति सम्मान का भी संदेश देता है, क्योंकि हम एक विशाल वृक्ष की पूजा कर उसे संरक्षित करने का संकल्प लेते हैं।
