News desk| उत्तर भारत में होली के त्योहार की कल्पना बिना ‘कटर-पटर’ यानी पापड़ और चिप्स के अधूरी है। जहाँ एक तरफ गुझिया मिठास घोलती है, वहीं पापड़ होली के उत्सव को चटपटा और कुरकुरा बनाते हैं।
1. परंपरा: क्यों खास है होली पर पापड़?
होली पर पापड़ खाने के पीछे केवल स्वाद ही नहीं, बल्कि गहरी सांस्कृतिक और वैज्ञानिक मान्यताएं हैं:
- होलिका की अग्नि और सेहत: पुरानी मान्यताओं के अनुसार, होलिका दहन की पवित्र अग्नि में पापड़ सेक कर खाने से शरीर की इम्युनिटी बढ़ती है।
- पाचन का साथी: होली पर हम जमकर तली-भुनी चीजें और मिठाइयां खाते हैं। पापड़ में मौजूद हींग, काली मिर्च और जीरा पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने में मदद करते हैं।
- सामूहिकता का प्रतीक: होली से पहले घरों की छतों पर महिलाओं का समूह मिलकर पापड़ बेलता है, जो आपसी प्रेम और सामुदायिक जुड़ाव को दर्शाता है।
2. बाज़ार में उछाल: करोड़ों का ‘कुरकुरा’ बिजनेस
होली का सीजन आते ही उत्तर भारत के बाजारों में पापड़ की मांग में जबरदस्त वृद्धि होती है:
- बिक्री का आंकड़ा: विशेषज्ञों के अनुसार, केवल उत्तर भारत में होली के दौरान पापड़ और चिप्स का बाज़ार ₹500 करोड़ से ₹1,000 करोड़ के आंकड़े को पार कर जाता है।
- लोकल से ग्लोबल: इस दौरान Lijjat और Mother’s Recipe जैसे बड़े ब्रांड्स की बिक्री में 30% तक का इजाफा होता है, लेकिन असली रौनक स्थानीय मंडियों में दिखती है।
- रोजगार का जरिया: यह सीजन हजारों महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और छोटे गृह उद्योगों के लिए साल की सबसे बड़ी कमाई का जरिया बनता है।
3. बदलता ट्रेंड: पारंपरिक से आधुनिक तक
आज बाज़ार में केवल आलू या दाल के पापड़ ही नहीं, बल्कि मसाला पापड़, नाचोस स्टाइल पापड़ और रोस्टेड हेल्दी पापड़की भी भारी डिमांड है। लोग अब ट्रेडिशनल स्वाद के साथ-साथ Online Grocery Platforms से रेडी-टू-फ्राई विकल्प चुन रहे हैं।
निष्कर्ष:
होली पर पापड़ केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि हमारी विरासत का हिस्सा है। इस बार जब आप पापड़ का आनंद लें, तो याद रखें कि यह छोटा सा पापड़ न केवल आपके स्वाद को बढ़ा रहा है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और छोटे कारीगरों को भी ताकत दे रहा
