न्यूज डेस्क। सावन आ गया है और घेवर की महक से उत्तर भारत के हलवाइयों की गलियां महक उठी हैं। शुद्ध घी में बनी जालीदार और रबड़ी से भिगी घेवर जो मुंह में घुलते ही आनंद की अनुभूति कराती है। विरासत इतनी बड़ी के राजा-महाराजा के जमानों से अब तक बेटियों के सिंजारे (सुहाग की टोकरी) की खूबसूरती बढ़ा रही है। भगवान कृष्ण को चढ़ाए जाने वाले 56 भोग में से एक भी इसे माना जाता है। सावन की इस विशेष मिठाई को जानने चलिए घेवर की विरासती गलियों में चलते हैं और जानते हैं कि सावन में इसका महत्व इतना क्यों है।

घेवर हजारों सालों से राखी और तीज की शोभा बढ़ा रही है। इसके बिना बहन की राखी अधूरी है तो बेटी का तीज भी। घेवर की उत्पत्ति को लेकर कुछ इतिहासकार इसे फारस से मुगलों द्वारा आया बताते हैं, लेकिन सच कहा जाए तो यह राजस्थान की मूल मिठाई मानी जाती है। यह जयपुर और सांभर की मूल मिठाई है। जयपुर की बसावट से पहले आमेर के राजा तीज त्योहारों पर सांभर से घेवर मंगवाया करते थे। 1727 में जब जयपुर शहर बसाया गया तब राजा जयसिंह द्वितीय ने सांभर के घेवर कारीगरों को जयपुर में बसाया था। राजस्थान कि पुरानी कहावतों में आज भी घेवर का ताना-बाना मिल ही जाता है। इसलिए यह भारत की मूल मिठाई है यह कहना गलत नहीं होगा।

सावन में वातावरण में नमी के कारण शरीर में वात्त पित्त दोष बढ़ जाता है। घेवर शुद्ध घी से बना होता है जो वात्त पित्त दोष को शांत कर शरीर का संतुलन बनाता है। सावन में नमी के कारण अन्य मिठाइयां जहां खराब हो जाती हैं, घेवर नम होने के कारण शरीर के लिए लाभदायक माना गया है।

सावन में घेवर की खूबसूरती देखनी है, तो चले आइए, राजस्थान, गुजरात, दिल्ली, उत्तर-प्रदेश, हरियाणा जहां कि गलियां इन दिनों घेवर की खुशबू से महकी हुईं हैं, और बेकरार हैं, लाल-पीली खूबसूरत टोकरियों में बहन के सिंजारे से लिपटकर मायके का मान बढाने, ससुराल की ओर।


