न्यूज डेस्क। मकर संक्रांति का छत्तीसगढ़ में विशेष महत्व है। इस पर्व के आते ही घरों में तिल की खुशबू और इससे बनने वाले व्यंजनों के चटकारे लगने लगते हैं। तिल के लड्डू को छत्तीसगढ़ी में तिली लाडू कहा जाता है। आज के समय के बच्चों को पता नहीं होगा, लेकिन पुराने दौर में दादा-दादी और नाना-नानी अपने नातिनों को प्यार से तिली लाडू के नाम से संबोधित करते थे जिसका मतलब होता है, ‘अतिप्रिय।’
दूसरे राज्यों में जो तिल के लड्डू बनते हैं उनके आगे छत्तीसगढ़िया तिल के लड्डू एक अलग ही स्वाद बिखेरते हैं। भूने हुए तिल की भिनी खुशबू, देशी गुड़ कोई मावा मेवा नहीं सिर्फ मूंगफली का मिश्रण इस तिल के लड्डू को उंमदा बना देता है। यही वजह है कि यहां के लड्डू की डिमांड छत्तीसगढ़ी बहनों के किचन से विदेशों तक पहुंच रही है। इसके अलावा तिल की बिजौरी, रखिया की बड़िया, लाई और भात बड़ी का स्वाद भी इंस्टाग्राम के जरियों हमारी बहनों विदेशों तक बिखेर रखा है।
इस दिन लोग नदियों में स्नान करने जाते हैं। पुराने जमाने में मकर संकां्रति तक तिल की फसल तैयार हो जाया करती थी। छत्तीसगढ़ में इसी दिन से सब्जी में तिल का बघार लगना भी शुरू हो जाता था, जो पूरे माघ मास तक हर सब्जी में डालकर लगाया जाता था।
यह भी माना जाता है कि इस दिन तिल का दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। छत्तीसगढ़ी में कहू तो, ‘तभे दाई कहाय, ‘जा फलाना घर संक्रांत के तिली लाडू देके आबे।’
इस दिन पितरों को तिल तर्पण भी किया जाता है। हवन में भी तिल डाला जाता है। इस दिन माघ मास का आरंभ होता है। विभिन्न ज्योतिषों के अनुसार, 15 जनवरी को मकर संक्रांति मनाए जाने कि तिथि मानी जा रही है, क्योंकि इसी दिन सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में अर्ध रात्रि में प्रवेश करेगा। इसीलिए दूसरे दिन मकर संक्रांति पर्व यानि 15 जनवरी को मनाई जाएगी।
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