न्यूज डेस्क। आप जब भी मंदिर जाते हैं तो सिर पर वस्त्र रखते हैं, क्योंकि भगवान के सामने सिर ढकने की प्रथा शुरुआत से चलती आई है। जब घर पर पूजा होती है और आप अपने भाइयों को तिलक लगाती है तो भी रूमाल से पुरुषों को और स्त्रियों को दुपट्टे से सिर ढकने की प्रथा आपने देखी है।
लेकिन आपको पता है कि सनातन धर्म में तो सिर ढककर पूजा करने, मंदिर जाने या किसी शुभ कार्य करने पर सिर ढकने की ऐसी कोई प्रथा है ही नहीं, बल्कि सिर खोलकर पूजा करने की प्रथा है जिसका श्लोक भी हमारे पुराणों में वर्णित है।
सनातन धर्म के पद्म पुराण के अनुसार, “सिर प्रावृत्य वस्त्रे ना ध्यान मेन प्रशस्यते” यह पद्म पुराण के ग्यारहवे अध्याय के नौवें श्लोक में वर्णित है। जिसका अर्थ है कि भोजन,पूजन, हवन इत्यादि में सिर पर वस्त्र नहीं रखना चाहिए।
लघु शंका, दीर्घ शंका, शौच इत्यादि क्रियाओं में सिर पर वस्त्र रखा जाता है।
