भगवान राम जब जल में समाधि लेने पहुंचे थे तो उनकी पूरी प्रजा इस घाट पर पहुंच गई थी। माना जाता है कि अयोध्या की पूरी प्रजा ने भी राम का नाम लेकर सरयू में समाधि ले ली थी।
न्यूज डेस्क। इस दुनिया में जो भी आया है उसे जाना ही है। चाहे वह मनुष्य हो या फिर भगवान के रुप स्वयं भगवान अवतार। इसलिए तो कहा जाता है, “राम नाम सत्य है।” फिर भी मृत्यु झूठ लगे तो यह गीत सुन लेना, “क्या तन मांजता रे एक दिन माटी में मिल जाना।” मृत्यु सत्य है, इसीलिए तो ईश्वर ने भी अपने हर एक अवतार में मनुष्य को इसकी सीख दी है, लेकिन मोहमाया की जंजीरों में जकड़े, “हम लोग” इसे पहचानने में शायद पूरा जीवन लगा देते हैं।
इसे और अच्छी तरह से जानना हो तो कभी श्रीराम की नगरी अयोध्या जाएं तो गुप्तार घाट चले आइएगा।। सरयू नदी का यह घाट आपको एक अलौकिक शांति की अनुभूति कराएगा। यह अयोध्या का वह धाम है जहां श्रीराम अपने परमधाम में विलिन हो गए थे। अयोध्या से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गुप्तार घाट वही जगह जहां सरयू नदी के किनारे भगवान श्रीराम ने क्वांर के महीने में जल समाधि ली थी।
जमीन के अंदर दबी हैं मूर्तियां
मुगल आक्रमणकारी जब अयोध्या के राम मंदिर को ध्वस्त कर रहे थे तब वहां के पुजारियों ने राम मंदिर की प्राचीन मूर्तियों को इसी गुप्तार घाट के अंदर मिट्टी में गाड़ दिया था। आज भी वह मूर्तियां गुप्तार घाट में ही कहीं पर दबी हुई हैं। यह फैजाबाद जिले का सबसे सुंदर और सबसे शांत घाट है।
प्रजा ने भी ली थी समाधि
भगवान राम जब जल में समाधि लेने पहुंचे थे तो उनकी पूरी प्रजा इस घाट पर पहुंच गई थी। माना जाता है कि अयोध्या की पूरी प्रजा ने भी राम का नाम लेकर सरयू में समाधि ले ली थी। समाधि लेने से पहले भगवान श्रीराम ने दक्षिण मुख कर अपने पितरों को जल दिया था और यहीं से वैकुंठ की ओर प्रस्थान किया था।
हुनमान को आदेश
भगवान राम ने ही हनुमान जी को आदेश दिया था कि वह लोगों की रक्षा के लिए अयोध्या के सबसे ऊँचे स्थान पर विराजमान हों। इसीलिए आज हनुमान गढ़ी अयोध्या के सबसे ऊँचे स्थान पर हैं जहां आज भी भगवान हनुमान विराजमान हैं।
यहां के श्रीराम नहीं धारण करते धुनष
गुप्तार घाट का नाम गौ प्रकार घाट भी है। गुप्तार घाट में आज भी सरयू नदी दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है, जबकी पूरी अयोध्या में नदी पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है। यहां स्थित रामजानकी, लक्ष्मण मंदिर में भगवान के हाथ में धनुष बाण नहीं है, क्योंकि अंतिम समय में जब भगवान यहां आए थे तो सब कुछ त्याग कर आए थे। जबकि देश के अन्य मंदिरों में आप भगवान के हाथ में धनुष बाण देखेंगे।
