न्यूज डेस्क। छत्तीसगढ़ के बस्तर शहर के कांगेर वैली राष्ट्रीय उद्यान में सराई के पेड़ों के जंगलों से होते हुए एक हजारों साल पुरानी गुफा आती है जिसका नाम है कैलाश गुफा। अपने अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए जानी जाने वाली इस गुफा आकर्षण यहां के स्टैगलेटाइट, स्टैलगमाइट यानि चूना पत्थर की गुफाओं में पानी के टपकने से बनने वाली प्राकृतिक संरचाओं की आकृतियां हैं जो इस गुफा में प्राकृतिक रूप से बनी हुई हैं।

घने जंगलों में कच्चे रास्तों से होते हुए इस गुफा तक पहुंचना भी किसी एडवेंचर से कम नहीं है। फिर भी कई यूट्यूबर्स इन गुफाओं तक कंटेट क्रिएट की चाह पर पहुंच रहे हैं, ताकि आप तक इसकी खूबसूरती पहुंच सके। इसी रास्ते पर कुंटुंबसर गुफा भी आता है जो छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध गुफा है और यह भी अपनी इसी तरह की चूना पत्थरों से बनी प्राकृतिक संरचनाओं के लिए फेमस है। कैलाश गुफा की खोज 22 मार्च 1993 में हुई थी। इस गुफा की लंबाई 1000 फीट है। इस गुफा तक पहुंचने के लिए कुछ सीढ़ियां भी चढ़नी पड़ती हैं ये सीढ़ियां पहाड़ी चट्टानों के किनारे से नीचे उतारती हुईं एक छोट से गेट से आपको इस गुफा के अंदर ले जाती हैं। जहां से शुरू हो जाती है इस गुफा की खूबसूरती। नीचे उतरते ही चूने के पत्थरों से आपको पानी के रिसने से ऐसी सुंदर आकृतियां दिखाई देती हंै जो लगता है जैसे चूने के पत्थरों से चुनाई कर किसी शिल्पकार ने अपनी शिल्प कला उकेरी हो। चूने के पत्थरों से पुतलों की फौज सी बनी आकृतियां गुफा की शुरुआत में ही लोगों को अपनी ओर खींचती हैं। इन गुफाओं में बनी आकृतियां कहीं इंद्रदेव की सभा सी लगती हैं तो कहीं इनमें शिवलिंग और गणपति नजर आते हैं। गुफा में मिट्टी को काटकर बनाई गईं संकरी सीढ़ियों से आपको गुजरना होता है, चलते वक्त पैरों की स्टेप्स भी एहतियाति रखने पड़ते हैं, क्योंकि यहां स्लिप होने का भी खतरा होता है। मगरमच्छ की आकृति, देवी दुर्गा का स्वरूप और कई तरह की आकृतियां, यूं कहे कि बस आपकी बेहतर कल्पनाशीलता और प्रकृति की प्राकृतिक कला का गठजोड़ बंधन बनाने की जरूरत है कि कैलाशगुफा में आपको वल्र्ड का हर टैक्सचर नजर आएगा। आध्यात्म की हर बूंद दिखाई देगी और जब आप यहां से बाहर निकलेंगे तो प्रकृति की कलाओं के संसार से रूबरू हो चुके होंगे।
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