नील पर्वत जहां मां की गोद में विराजे हैं हनुमान
न्यूज डेस्क। भारत के हर गलियों पर आपको भगवान हनुमान के बजरंगबली रूप के दर्शन जरूर हो जाएंगे, लेकिन बाल रूप के मंदिरों आपकों गिने-चुने स्थानों पर मिलेंगे। बजरंगबली के इसी बाल रूप का एक मंदिर हरिद्वार में स्थित हैं। नील पर्वत स्थित सिद्धपीठ मां चंडी की पहाड़ी से होकर कुछ सीढ़ियां एक दूसरी पहाड़ी की ओर जाती है। रास्ते पर दर्जनों से ज्यादा बंदर आपके झोले की प्रसादी और पानी की बाॅटल खींचते नजर आएंगे। बस इन्ही बंदर महराजों का सामना करने के बाद आपको पहाड़ी में मिलेंगे हनुमान लला।
भगवान हनुमान यहां माता अंजनी की गोद में शिशु रूप में हैं। इस जगह की महिमा स्कंद पुराण के केदारखंड में भी बतलाई गई है। अंजनी माता ने यहां अपने बाल्यरूप में तप किया था।
पंडितों द्वारा बताई कथा
यहां के पंडितों द्वारा बताई गई कथानुसार, एक बार इंद्र देव ने गौतम ऋषि का भेष लेकर माता अहिल्या से छल किया था| उनकी पुत्री अंजनी भी उनके साथ थी। देवी अहिल्या पर जब कलंक लगा तो खुद को निर्दोष साबित करने के लिए उन्होंने अपनी पुत्री अंजनी को यह बताने को कहा कि उनके साथ कौन था! माता अंजनी बालिका थी| उन्होंने वही कहा जो उन्होंने देखा था। उन्होंने कहा कि उन्होंने एक पिता गौतम ऋषि को इधर से भागते देखा है और एक पिता गौतम ऋषि को नदी की ओर से आते देखा है।
माता अहिल्या को जब गौतम ऋषि ने पत्थर बनने का श्राप दिया था। उसी समय माता अहिल्या ने भी क्रोधित होकर अंजनी माता को श्राप दिया था कि वह कुंआरी ही मां बनेगी। इस श्राप से बचने के लिए अंजनी माता ने नासिक स्थित गौतम ऋषि का आश्रम त्याग दिया| और कजरी वन नील पर्वत में तपस्या करने लगीं।
माना जाता है कि भष्मासुर राक्षस को मारने के लिए जब भगवान विष्णु ने मोहनी रूप धारण किया था। उनके मोहनी रूप को देख भगवान शिव की शक्ति रसखलित होकर गिरने लगी| जिसे धरती भी सहन नहीं कर सकती थी। सप्तऋषियों ने इसे एक पीपल के पत्ते में रख कर अपने कमंडल में रखा हुआ था| उन्हें भगवान के ग्यारहवें अवतार का ज्ञान पहले ही था। देवताओं और ऋषियों ने देखा कि माता अंजनी को मिले श्राप और उनके तपबल के कारण केवल वह ही इसे धारण कर सकती हैं। सभी देवताओं और ऋषियों ने माता अंजनी के द्वार पर आकर उनसे भीक्षा मांगी। माता अंजनी जब भीक्षा देने लगी तो सभी देवताओं और ऋषियों ने उनसे कहा कि वह भीक्षा तभी लेंगे जब वह अपने कान से उनका गुरुमंत्र धारण करेंगी। माता अंजनी के कान में गुरु मंत्र के द्वारा भगवान शिव की शक्ति स्थानांतरित की गई। भगवान के जन्म की दो कथाएं हैं। इस कथानुसार इसके लिए देवताओं में पवन देव की सहायता ली गई इसीलिए भगवान पवन पुत्र कहलाए। शिव के ग्यारहवें रूद्रअवतार के रूप में भगवान हनुमान का जन्म हुआ।
मंदिर में माता अंजनी की दो मूर्तियां
मंदिर में माता अंजनी और भगवान हनुमान के बाल रूप की एक मूर्ति है। जिसमें हनुमान बालक अवस्था में हैं। एक मूर्ति में बाल हनुमान माता अंजनी की गोद में शिशु रूप में हैं। इस प्राचीन मूर्ति के समीप में ही माता अहिल्या की मूर्ति भी है जो हनुमान जी की नानी हैं। पहले यह मंदिर गुफा स्वरूप में थी जिसे राजाओं द्वारा जिर्णोद्वार कर मंदिर स्वरूप दिया गया।
भगवान हनुमान जन्म कर्नाटक में हुआ
भगवान हनुमान का जन्म कर्नाटक की किष्किंधा नगरी जिसे हम्पी के नाम से जाना जाता है वहां हुआ है। यहां एक आंजनेय पर्वत हैं जहां भगवान हनुमान को माता अंजनी ने जन्म दिया था।
