न्यूज डेस्क। हिन्दू धर्म में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाए जाने वाले गणगौर पर्व का अपना अलग ही महत्व है। अखंड सौभाग्य के लिए सुहागनों द्वारा रखे जाने वाले इस पर्व की छटा देखते ही बनती है। नवविवाहित बेटी इसे अपने मायके में रखती है, जहां कई तरह रीति-रिवाजों के साथ यह पूरा किया जाता है।
कुवांरी कन्याएं भी मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत को करती हैं। इसर जी और गौरा जी के गीतों से गूंजता यह पर्व शिव-पार्वती को समर्पित है। फागुन मास की पूर्णिमा से शुरू होने वाला यह पर्व 18 दिनों का होता है, लेकिन मुख्य पूजा शुक्ल पक्ष की तृतीया को की जाती है।
गणगौर तिथि
इस साल गणगौर व्रत 31 मार्च को रखा जाएगा। नवरात्रि के तीसरे दिन मनाए जाने वाले शुक्ल पक्ष की यह तृतीया तिथि 31 मार्च को 9 बजकर 11 मिनट से शुरू होकर 1 अप्रैल को शाम 5 बजकर 42 मिनट पर समाप्त होगी।
पति से दूर होती है पूजा
गणगौर की पूजा पति से छुपा कर की जाती है। यह व्रत रखने वाली महिलाएं जितने दिन घर में पूजा करती है, पति को इस पूजा के दर्शन करना वर्जित होता है। पति को इसका प्रसाद भी नहीं दिया जाता।ऐसा माना जाता है कि पति से छुपाकर इस व्रत को करने से ही यह पूर्ण होता है और माता पार्वती का आशीर्वाद उन्हें मिलता है। महिलाएं पूजा के बाद अपने से बड़ी बहनें, जेठानी, सास, ननद आदि को सुहाग का उपहार भेंट करती हैं।
गणगौर की पूजा विधि
गणगौर व्रत के दिन भगवान शिव और माता गौरी की मिट्टी से मूर्ति बनाकर उन्हें सुंदर वस्त्र पहनाकर सजाएं। देवी पार्वती को सुहाग सामग्री अर्पित करें। भगवान शिव को चंदन लगाएं और देवी गौरी को चंदन, अक्षत, रोली, कुमकुम लगाएं। धूप, दीप, फल, मिठाई का भोग लगाएं और दूर्वा अर्पित करें। पूजा की थाली में चांदी का सिक्का, सुपारी, पान, दूध, दही, गंगाजल, हल्दी, कुमकुम, दूर्वा डालकर सुहाग जल तैयार करें। सुहागजल को भगवान शिव और देवी गौरी पर छींटें लगाएं। इसके बाद सुहाग जल अपने ऊपर छिड़कें। चूरमे का भोग लगाएं। गणगौर की व्रत कथा सुनें।
