न्यूज डेस्क। हिन्दू धर्म में होली का त्योहार बसंत पंचमी के दिन से ही शुरू हो जाता है और इसी दिन से होलिका दहन की तैयारी या स्थापना भी शुरू कर दी जाती है। कई दिनों पहले से होलिका दहन के लिए लकड़ियां इक्ट्ठा करना शुरु कर दिया जाता है। होलिका दहन में सबसे विशेष होते हैं, गोबर के उपले यानि बड़कल। होली पर बनने वाले बड़कल की माला की अपनी अलग ही मान्यता है।
उत्तर भारत में बड़कल को गुरेली, गुरकेल, बड़कुले आदि नामों से जाना जाता है। इसे बनाने की शुरुआत फागुन के शुक्ल पक्ष से शुरु होती है, जो एकादशी तक चलती है। हर दिन अलग-अलग प्रकार के बड़कल बनाए जाते हैं और इन्हे पितृ और देवों को समर्पित किया जाता है।
बड़कलों का महत्व
राजस्थान में बड़कलों का विशेष महत्व है। यह बड़कल पूजा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। पूरे समाज की कुशलता के लिए इसे बनाकर पूजा जाता है। एकादशी के दिन महिलाए व्रत कर इन बड़कलों की पूजा करती हैं।
परिवार की रक्षा के लिए
होलिका दहन की पूजा इसके बिना अधूरी होती है। परिवार में खुशहाली और परिवार के सदस्यों की कुशलता, निरोगी काया के लिए इसे बनाया जाता है और होलिका दहन के दिन होलिका माता को समर्पित किया जाता है। ताकि बदलते मौसम और बीमारियों से माता उनकी रक्षा करें।
गोबर से ही क्यों बनते हैं
गाय को हिन्दू धर्म में माता माना जाता है और इसमें सभी 33 कोटी देवी-देवताओं का वास होता है। गाय के गोबर से बने उपलों के धुओं से नकारात्मक शक्तियां नष्ट होती हैं। गोबर के बड़कलों को जलाने से होने वाला धुंआ मौसम बदलने की वजह से पनपने वाले बैक्टिरिया को नष्ट कर देता है। इसीलिए इसे गोबर से बनाया जाता है।
होलिका माता के बड़कल
बड़कल परिवार के प्रत्येक सदस्य के नाम पर 7,11, 21, 51, 101 की संख्या में बनाए जाते हैं। तलवार, चांद, सूरज, नारियल, पान, पूरी रोटी, आधी रोटी, गोल, हाथों की छाप, मुट्ठी के आकार, पटा, कंघा, माता का चरखा, कुकड़ी, खड़ाऊ सुराही, बाउड़ी, जीभ, सुपाड़ी का आकार में बनया जाता है।
बच्चों के खेल-खिलौने
बड़कल में बच्चों के लिए गोबर के खेल-खिलौने भी बनाए जाते हैं। इसमें चूल्हा, चक्की, सिलबट्टा, लड्डू- पेड़े, बैट-बॉल बनाए जाते हैं।
होली और होला
बड़कल में सबसे विशेष होता है, होली और होला (प्रहलाद)। इसे शुक्ल पक्ष की ग्यारस (एकादशी) के दिन बनाया जाता है।बड़कुले बनाने से पहले जिस जगह पर यह बनाया जाता है उसे गोबर या गेरु से लिपकर उस पर आटे या रंगोली से स्वास्तिक बनाया जाता है। इसके बाद 5, 7, 11 की संख्या में बड़कुले बनाकर फूल, रोली, चंदन से इसकी पूजा की जाती है। होलिका और होला का श्रृंगार भी किया जाता है। कौड़ी से आंखें बनाई जाती हैं। गोबर से बनाए गए होला और होली को रंगोली, मेहंदी, हल्दी, कपड़ों की करतन से सजाया जाता है। इसी दिन पान-सुपाड़ी भी बनाई जाती है।
होलिका दहन के दिन इसे धागे में पिरोकर होलिका को समर्पित किया जाता है और विधि-विधान से होलिका दहन की पूजा की जाती है।
सोशल मीडिया के इस जमाने में बहुत कम लोगों में पुराने रीति-रिवाजों में रुचि होती है, लेकिन उत्तर-प्रदेश, मध्य-प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, बिहार में आज भी यह प्रथाएं जीवित है और निभाई जाती हैं।
