डेस्क न्यूज। होली का रंग गुजिया के स्वाद के बिना अधूरा है। होली के एक हफ्ते पहले ही भारतीय रसोई में इसकी महक छाने लगती है। हर राज्य में अलग-अलग नामों से जानी जाने वाली गुजिया के बिना ब्रज की होली भी अधूरी है। शुद्ध घी में बनी और चाशनी से भीगी हुई यहां कि गुजिया का स्वाद सारे भारत की गुजिया से निराला है। इसलिए कभी ब्रज के लिए निकले तो स्वाद लेना न भूलिएगा। भगवान कृष्ण को तो यहां 365 दिन इस स्वादिस्ट मिठाई का भोग लगता है, पर होली में विशेष रूप से बनाया जाता है।
तुर्कियों की बकलावा
कहा जाता है कि गुजिया तुर्की से आई मिठाई बकलावा का रूप है| 13 वीं शताब्दी में मुगलों द्वारा यहां लाई गई और बुंदेलखंड से पूरे भारत के राज्यों में खाई जाने लगी। कुछ तो यह भी कहते हैं कि यह नमकीन समोसे का ही मिठा रूप है। पहले इसे आटे की पतली रोटी में गुड़ और शहद भरकर धूप में सूखाकर बनाया जाता था।
ब्रज ने बढ़ाया चलन
कुछ का मानना है कि इसका चलन ब्रज से ही आया है। मथुरा से लेकर वृंदावन तक भगवान को गुजिया से भोग लगाया जाता है| इसे गुड़ और आटे से बनाया जाता था। पहले इसे समोसे की शक्ल और फिर चंद्राकार शेप में बनाया जाने लगा।
प्राचीन भारत है जनक
गुजिया की वास्तविक उत्पत्ति प्राचीन भारत में हुई है, जिसका उल्लेख संस्कृत ग्रंथों में पाए जाने वाले ‘करणिका’ नामक मीठे व्यंजन से मिलता है। यह एक ऐसा व्यंजन है जो सूखे मेवों से भरा होता है और शहद से मीठा होता है, जो आधुनिक गुजिया के संभावित पूर्वज की ओर इशारा करता है।
पूरा चांद या अधूरा
गुजिया को अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। इसे करंजी, पेड़किया, घुघरा, केलकेली, गुझिया, गुंजिया के नामों से जाना जाता है। इसी की तरह एक मिलती-जुलती मिठाई चंद्रकला है जो बुंदेलखंड में खाई जाती है। गुजिया जैसे आधे चांद का रूप है, वैसे ही चंद्रकला पूरे चांद की तरह गोल होती है। कही इसमें सूजी और नारियल चूरे का भरावन होता है तो कही खोया और सूखे ड्रायफ्रूट्स का। वृंदावन में आप को यह चाशनी में भीगा कर दी जाती है। ज्यादातर राज्यों मैदे की परत के अंदर स्थित भरावन में ही मीठे का उपयोग होता है।
गुजिया और मावा का मिलन
गुजिया का उल्लेख मुगल काल में 16वीं-18वीं शताब्दी के दौरान भी मिलता है। इसी अवधि के दौरान गुजिया में खोये मावा का उपयोग शुरू हुआ था। गुजिया पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में प्रसिद्ध हैं, लेकिन उत्तर-प्रदेश और मध्य-प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता चरम पर है। गुजिया रानी भले कहीं से भी आई हो पर भारत की होली इसके बिना अधूरी है। घर-घर बनने वाली ये गुजिया प्यार, भाईचारे, अपनेपन की एक मीठी पूरी है।
