डेस्क न्यूज। महाशिवरात्रि सनातन धर्म का एक बड़ा पर्व है। भगवान शिव की पूजा को समर्पित इस पर्व में शिव पूजा विधि, व्रत के बारे में तो आप जानते ही होंगे, लेकिन क्या आप भगवान शिव के अनादि काल से जाने जा रहे उन 18 अवतारों को जानते हैं!
भगवान शिव के 18 अवतारों के नाम वीरभद्र, पिपलाद, नंदी, अश्वत्थामा, शरभ, दुर्वासा, गृहपति, हनुमान, ऋषभ, यतिनाथ, कृष्णदर्शन, अवधूत, भीक्षवर्यु, किरात, सुनटनतर्क, ब्रम्हचारी, यक्ष हैं।


वीरभद्र
शिवजी के इस अवतार को शिव का गण माना जाता है, जोकि उनकी जटा से उत्पन्न हुआ था। वीरभद्र की उत्पत्ति से जुड़ी कथा के अनुसार, जब देवी सति ने अपना देह त्याग दिया था तब भगवान शिव ने इसकी उत्पत्ति की थी, जिसने दक्ष का अभिमान तोड़ने के लिए उसका सिर धड़ से अलग कर दिया था।


पिपलाद
पिपलाद महर्षि दधीचि के पुत्र थे। अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए महर्षि पिपलाद ने शनिदेव को नक्षत्र मंडल से गायब हो जाने का श्राप दे दिया था, जिसकी वजह से शनिदेव अपने जन्म से 16 वर्ष की आयु तक किसी भी राशि को प्रभावित नहीं कर पाए थे। महर्षि पिपलाद का नाम लेने मात्र से ही शनि प्रभाव कम होने लगता है।


नंदी
शिलाद नामक एक ब्रह्मचारी ने भगवान शिव से मृत्युहीन संतान की प्राप्ति हेतु तपस्या की थी। शिव वरदान से शिलाद को भूमि जोतते समय भूमि से एक बालक मिला था, जिसका नाम उसने नंदी रखा। भगवान शिव ने उसे अपना गणाध्यक्ष बनाया था और सुयशा से उसका विवाह हुआ था।

भैरव
एक बार भगवान ब्रह्मा और विष्णु में खुद की श्रेष्ठता को लेकर बहस होने लगी। इस दौरान भगवान शिव ने अपने ज्योतिपुंज के दोनों छोरों की तलाश के लिए दोनों को भेजा। उस लिंग रूपी ज्योर्तिपुंज का कोई भी छोर नहीं मिलने के बावजूद भगवान ब्रह्मा ने उसका छोर देखने की बात कहकर झूठ बोल दिया। इसी बात पर क्रोधित भगवान शिव ने भैरव की उत्तपत्ति की। शिव की आज्ञा पर भैरव ने भगवान ब्रह्मा का पांचवा सिर काट दिया। जिसके लिए उन्हें ब्रह्महत्या का पाप लगा था।

अश्वत्थामा
गुरु द्रोणाचार्य ने भगवान शिव को अपने पुत्र के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। तब भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया था जिसे उन्हें अश्वत्थामा की प्राप्ति हुई थी। अश्वत्थामा के माथे पर एक मणि होता था जोे जन्म से ही उन्हें मिला था। अर्जुन की पुत्रवधु उत्तरा के गर्भ और पांडवों के कुल को नष्ट करने की वजह से भगवान कृष्ण ने उन्हें श्राप दिया था। अश्वत्थामा सात चीरंजीवियों में से एक हैं। माना जाता है कि वह आज भी धरती में है।

शरभावतार
भगवान शिव का यह अवतार आधा मृग और आधे पक्षी के शरीर वाला अवतार है। इसे आठ पैरों वाला जंतु कहा जाता है जो शेर से अधिक शक्तिशाली था। हिरणकशिपु के वध के बाद जब भगवान नृसिंहअवतार शांत नहीं हो रहे थे। तब भगवान शिव ने उनकी क्रोधाग्नि को शांत करने के लिए शरभाअवतार लिया था, जो नृसिंह भगवान को शांत करने के लिए उन्हें अपनी पूंछ से बांधकर आकाश में उड़ गया। तब भगवान नृसिंह ने शांत होकर विनम्र भाव से शरभ से खुद को छोड़ देने की विनती की थी।

गृहपति
नर्मदा तट पर रहने वाले एक विश्रवनार नमाक ऋषि और उनकी पत्नि शुचिमति ने भगवान शिव के सामने पुत्र की कामना की थी। पुत्र प्राप्ति के लिए विश्वनार जब काशि तट पर भगवान शिव के वीरेश लिंग की अराधना कर रहे थे तो उसे लिंग के मध्य सें एक बालक की प्राप्ति हुई थी। मुनि ने उसी बाल रूपी शिव की अराधना की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे शिव अवतार के रूप पुत्र बनकर जन्म लेने का वरदान दिया जो गृहपति कहलाए। गृहपति ने जो शिवलिंग की स्थापना की थी, वह अग्निश्वर नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस शिवलिंग का दर्शन करने से व्यक्ति बिजली और अग्नि से भयभीत और पीडित नही होता। हमारे शरीर में जो जठराग्नि है, वह ही भगवान शंकर का गृहपति अवतार है। भूख लगने पर हम जो अन्न ग्रहण करते हैं, उसी से हमारे शरीर का पोषण होता है और प्राण को संतुष्टि प्राप्त होती है।

ऋषि दुर्वासा
सति अनुसूइया के पति महर्षि अत्रि ने पुत्र कामना हेतु घोर तपस्या की थी। जिससे प्रसन्न होकर भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने उन्हें अपने अंशों से तीन पुत्रों के होने का वरदान दिया था। ब्रह्मा ने उन्हें अपने अंश से च्रंद्रमा, विष्णु ने दतात्रेय और भगवान शिव के अंश से दुर्वासा ऋषि की उत्तपत्ति हुई थी।

हनुमान
समुद्रमंथन के दौरान जब देवताओं और दानवों को अमृत बांटने के लिए भगवान विष्णु ने मोहनी रूप धारण किया था तो भगवान शिव उनके रूप से मोहित हो गए थे। इस दौरान लीलावश उन्होंने वीर्यपात कर दिया था, जिसे सप्तऋषियों ने पत्तों में संग्रहित कर वनराज केसरी की पत्नि अंजना के कान के माध्यम से उनके गर्भ में स्थापित कर दिया था। जिससे भगवान महाबलशाली वीर हनुमान का अवतार हुआ।

वृषभ अवतार
समुद्र मंथन से हारने के बाद असुर जब पाताल की तरफ भागने लगे तो भगवान विष्णु उनके पीछे चले गए और उन्होंने सभी असुरों को मार डाला। विष्णु जी जब वापिस जाने लगे तो उन्होंने देखा कि पांच सुन्दर स्त्रियां उनकी तपस्या कर रही हैं। वे पांचों माता लक्ष्मी की बहनें थीं जो उनके भाग्य से ईर्ष्या करती थीं। भगवान विष्णु ने वर मांगने को कहा तो उन्होंने कहा कि वे देवी लक्ष्मी और बैकुण्ठ को त्याग दे ना ही वे स्वयं को भी न पहचानें और सदा पाताल में उनके साथ निवास करें। भगवान विष्णु ने तथास्तु कह दिया जिससे वे स्वयं को भी भूल गए। पाताल में रहते समय उन्होंने उन स्त्रियों से कई पुत्र उत्पन्न किए। भगवान विष्णु के इन्हीं पुत्रों ने पाताल से स्वर्ग तक उत्पात मचाया और इनसे दुःखी होकर सभी महादेव के पास गए। भगवान शिव ने भगवान विष्णु को पाताल से लाने और उनके पुत्रों को मारने के लिए एक बहुत बड़े नील रंग के वृषभ अर्थात् नीले रंग के बैल का रूप लिया और पाताल में जाकर उनका संहार किया। उन स्त्रियों ने भगवान विष्णु को ये बात बताई तो उन्होंने वृषभ रूपी भगवान शिव से युद्ध किया। उसी समय भगवान गणेश वहां प्रकट हुए और उन्होंने इस युद्ध को रोकने के लिए उन स्त्रियों को अपना वरदान वापस लेने को कहा। उनके वरदान वापस लेते ही भगवान विष्णु को सब स्मरण हो गया।

यतिनाथ
अंबुदाचल पर एक भील तथा भीलनी रहते थे। एक बार शिव ने उनकी परीक्षा लेने के निमित्त यति का रूप धारण किया और रात-भर उनके घर रहने की इच्छा प्रकट की। घर में दो से अधिक व्यक्ति नहीं आ सकते थे, अतरू भील रातभर पहरा देता रहा, भीलनी और यति घर के अंदर सोते रहे। रात में सिंहों ने भील को मारकर खा लिया तथा हड्डियाँ वहीं पर छोड़ दीं। भीलनी को प्रातरू ज्ञात हुआ तो वह यति पर रुष्ट न होकर अपने पति के भाग्य को सराहती रही तथा उसकी अस्थियों के साथ सती होने के लिए उद्यत हुई। शिव ने अपने रूप में प्रकट होकर उन दोनों को नल-दमयंती के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया तथा कहा कि हंस के रूप में वे उन दोनों के मिलन का निमित्त बनेंगे। शिव का वह रूप यतिनाथ के नाम से प्रसिद्ध है।


कृष्णदर्शन अवतार
इशवाकु वंशीय श्राद्ध देव की नवमी पीढ़ी में राजा नभग का जन्म हुआ था। विद्या अध्ययन के लिए गुरुकुल गए नबक जब बहुत दिनों तक नहीं लौटे, तो उनके भाइयों ने राज्य का बंटवारा कर लिया। नबक को जब यह बात पता चली, तो वह अपने पिता के पास गया। पिता ने नबक को सुझाव दिया कि आडिंग रस गोत्रिय ब्राह्मणों द्वारा एक यज्ञ किया जा रहा है जहां वह यज्ञ करते हुए प्रत्येक छठे दिन श्लोक और सूक्तियों के उच्चारण में गलती करते हैं तुम जाकर उनकी इन गलतियों का सुधार करो जिससे उनका यह कार्य फलीभूत हो पाए। नबक ने ऋषियों की सहायता की जब वह यज्ञ समाप्त कर स्वर्ग जाने लगे तो यज्ञ से बचा सारा धन वहीं छोड़ दिया जिसे नबक एकत्र करने लगे। इसी दौरान भगवान शिव कृष्ण दर्शन रूप में प्रकट हुए और उस धन पर अपना अधिकार जताने लगे। उन्होंने नबक को अपने पिता से ही निर्णय कराने को कहा। इस पर उसके पिता ने इस पर कृष्णदर्शन का अधिकार बताया। इस अवतार के माध्यम से भगवान शिव ने यज्ञ के दौरान बचने वाले अवशिष्ठ धन आदि के प्रति लोगों को संदेश दिया है।

अवधूत अवतार
अवधूत अवतार, भगवान शिव का एक अवतार है. सती के वियोग के बाद शिव ने अवधूत अवतार लिया था। इस अवतार में वे योगिनियों की तरह नग्न रहते थे और पूरे शरीर पर राख लगाते थे। एक बार बृहस्पति और अन्य देवता शिव के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत गए थे। इंद्र ने परीक्षा लेने के लिए शिव का अवधूत रूप देखकर उनका मार्ग रोक लिया। इंद्र ने अवधूत से बार-बार उनका परिचय पूछा। अवधूत ने कहा कि वे पुरुष हैं। इस पर क्रोधित होकर इंद्र ने वज्र फेंका, लेकिन उनका हाथ स्थिर हो गया।

भिक्षुवर्य अवतार
भगवान शिव का भिक्षुवर्य अवतार, कलियुग में धर्म और अधर्म के बीच फैल रहे अराजकता का प्रतीक है। इस अवतार की कथा के मुताबिक, भगवान शिव ने एक भिखारिन को बालक दिया और उसका पालन-पोषण करने का निर्देश दिया था। महाभारत युद्ध के बाद सभी देवता अपने-अपने लोक चले गए थे। पृथ्वी पर कलियुग शुरू हो चुका था। विदर्भ के राजा सत्यरथ पर शत्रुओं ने हमला कर दिया और उन्हें मार डाला। राजा सत्यरथ की गर्भवती पत्नी ने शत्रुओं से छिपकर अपने प्राण बचाए और एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया।
रानी को प्यास लगी थी, इसलिए वह अपने पुत्र को गोद में लेकर सरोवर की ओर गईं। घड़ियाल ने रानी को अपना आहार बना लिया। भगवान शिव की प्रेरणा से एक भिखारिन वहाँ पहुँची। भगवान शिव ने भिक्षुक का रूप धारण करके उस भिखारिन को बालक का परिचय दिया। भगवान शिव की कृपा से सत्यरथ के पुत्र ने अपने दुश्मनों का हराकर पुन राज्य प्राप्त कर लिया।

सुरेश्वर अवतार
इस अवतार में भगवान शिव ने एक छोटे से बालक उपमन्यु की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपनी परम भक्ति और अमर पद का वरदान दिया। व्याघ्रपाद का पुत्र उपमन्यु अपने मामा के घर पलता था। वह सदा दूध की इच्छा से व्याकुल रहता था। उसकी मां ने उसे अपनी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए शिवजी की शरण में जाने को कहा। इस पर उपमन्यु वन में जाकर ऊँ नमरू शिवाय का जप करने लगा। भगवान शिव सुरेश्वर (इंद्र) का रूप धारण कर उसके समक्ष उपस्थित हुए और वे शिव निंदा करने लगे। इस पर उपमन्यु क्रोधित होकर इंद्र को मारने के लिए खड़ा हो गया। उपमन्यु को अपने में दृढ़ शक्ति और अटल विश्वास देखकर शिवजी ने उसे अपने वास्तविक रूप के दर्शन कराए तथा क्षीरसागर के समान एक अनश्वर सागर उसे प्रदान किया। उसकी प्रार्थना पर कृपालु शिवजी ने उसे परम भक्ति का पद भी दिया।


किरात अवतार
किरात अवतार में भगवान शिव ने शिकारी का रूप धारण कर अर्जुन की परीक्षा ली थी। अर्जुन ने भगवान शिव से दिव्यास्त्र पाने के लिए कठिन तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने किरात के रूप में अर्जुन की परीक्षा ली। शिव जी ने देखा कि मूक नामक दानव सूअर के रूप में अर्जुन को मारने के लिए आ रहा है। अर्जुन और शिव दोनों ने एक साथ सूअर पर बाण चला दिए।दोनों में इस बात को लेकर बहस हो गई कि किसने सूअर को मारा है। यह बहस युद्ध में बदल गई। अर्जुन ने किरात पर बाण चलाए, लेकिन शिव ने उन्हें अपने अंदर ले लिया। अर्जुन ने शिव पर शिलाओं, वृक्षों, और मुक्कों से प्रहार किया, लेकिन शिव का बाल भी नहीं उड़ा। शिव ने अर्जुन पर प्रहार कर उसे मूर्छित कर दिया। होश में आने के बाद अर्जुन ने शिवलिंग पर पुष्पों का हार चढ़ाया और शिव की पूजा की। इसके बाद भगवान शिव ने अर्जुन को दिव्यास्त्र दिया।


ब्रह्मचारी अवतार
दक्ष के यज्ञ में प्राण त्यागने के बाद जब सती ने हिमालय के घर जन्म लिया तो शिवजी को पति रूप में पाने के लिए घोर तप किया। पार्वती की परीक्षा लेने के लिए शिवजी ब्रह्मचारी का वेष धारण कर उनके पास पहुंचे। पार्वती ने ब्रह्मचारी को देख उनकी विधिवत पूजा की। जब ब्रह्मचारी ने पार्वती से उसके तप का उद्देश्य पूछा और जानने पर शिव की निंदा करने लगे तथा उन्हें श्मशानवासी व कापालिक भी कहा। यह सुन पार्वती को बहुत क्रोध हुआ। पार्वती की भक्ति व प्रेम को देखकर शिव ने उन्हें अपना वास्तविक स्वरूप दिखाया।


सुनटनर्तक अवतार
पार्वती के पिता हिमाचल से उनकी पुत्री का हाथ मागंने के लिए शिवजी ने सुनटनर्तक वेष धारण किया था। हाथ में डमरू लेकर शिवजी नट के रूप में हिमाचल के घर पहुंचे और नृत्य करने लगे। नटराज शिवजी ने इतना सुंदर और मनोहर नृत्य किया कि सभी प्रसन्न हो गए।


यक्ष अवतार
देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया था, तब भयंकर विष निकला था। भगवान शंकर ने उस विष को अपने कंठ में धारण किया। इसके बाद अमृत कलश निकला और सभी देवता अमर हो गए। देवताओं को अभिमान हो गया कि वे सबसे बलशाली हैं। देवताओं के इस अभिमान को तोड़ने के लिए भगवान शंकर ने यक्ष का रूप धारण किया। उन्होंने देवताओं के सामने एक तिनका रखा और उसे काटने को कहा। अपनी पूरी शक्ति लगाने पर भी देवता उस तिनके को काट नहीं पाए। आकाशवाणी हुई कि यक्ष सब गर्वो के विनाशक हैं। सभी देवताओं ने भगवान शिव की स्तुति की और अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी।

By Pooja Patel

प्रोड्यूसर एंड सब एडिटर डेली हिन्दी मिलाप हैदराबाद, दैनिक भास्कर, नई दुनिया, भास्कर भूमि, राजस्थान पत्रिका में 14 वर्ष का कार्यानुभव

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