न्यूज डेस्क। हेडिंग पढकर थोड़ा अटपटा तो जरूर लगा होगा, पर बात सच है कि हमारे इतिहास से लेकर अब तक लोग ‘जंगल की आग’ के साथ होली खेलते आए हैं। यह होली बड़ी सात्विक, शुद्ध और पर्यावरण अनुकूल आदर्श होली है जो हर कोई खेलना पसंद करता है। हम बात कर रहे हैं पलाश (पलास, छूल, परसा, ढाक, टेसू, किंशुक, केसू) की जिसकी होली आज कल काफी ट्रेंड है। बाजार में आर्गेनिक कलर में सबसे ज्यादा डिमांड इसी के सूखे फूलों, पाउडर और तेल की है। डिमांड के चलते ये गली के सुपर मार्केट से लेकर आॅनलाइन मार्केट में अपनी धाक जमाए हुए है। इसके सूखे फूल, पाउडर बेचकर लोग लाखों की कमाई कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार ने तो इसकी खरीदी के लिए समर्थन मूल्य भी तय कर रखा है, पर अफसोस की आदिवासियों में जागरूकता की कमी के चलते यहां इसे लाभ नहीं मिल पा रहा है, जबकि बाजार में इसके फूलों और इसके रंगों से होली खेलने के लिए लोग अच्छी कीमत भी देने को तैयार हैं।
क्यों कहते हैं जंगल की आग
पलाशएक वृक्ष है जिसके फूल बहुत ही आकर्षक होते हैं। इसके आकर्षक फूलों के कारण इसे ‘जंगल की आग’ भी कहा जाता है। पलाश दो प्रकार का होता है। एक लाल पुष्पों वाला और दूसरा सफेद पुष्पों वाला। लाल फूलों वाले पलाश का वैज्ञानिक नाम ‘ब्यूटिया मोनोस्पर्मा’ है। सफेद पुष्पों वाले लता पलाश को औषधिय दृष्टिकोण से अधिक उपयोगी माना जाता है।
प्राचीन काल में लोग रात को जब अंधेरा होता था तो पलाश के वृक्ष को अपना मार्गदर्शक मान कर यात्रा करते थे, क्योंकि पलाश के पत्ते, पुष्प रात को दूर से ही चमकते हैं और लोग अंदाजा लगा लेते थे कि मार्ग इधर से हैं। लोगों को रास्ता बताने के लिए दिशासूचक के रूप में इसका उपयोग होता था। पलाश का पेड़ घोर अंधेरे में भी चमकता है इसीलिए इसको ‘जंगल की आग’ या ‘जंगल का प्रकाश’ भी कहा जाता है।
एंटीऐजिंग है
पलाश की फलियां कृमिनाशक का काम तो करती ही है। इसके उपयोग से बुढ़ापा भी दूर रहता है। पलाश फूल से स्नान करने से ताजगी महसूस होती है। पलाश फूल के पानी से स्नान करने से लू नहीं लगती तथा गर्मी का अहसास नहीं होता। काम शक्तिवर्धक और शीघ्रपतन की समस्या को दूर करता है।
धार्मिक महत्व
भारत के सुंदर फूलों वाले प्रमुख वृक्षों में से एक है। प्राचीन काल से ही इस वृक्ष के फूलों से होली के रंग तैयार किये जाते रहे हैं। ऋग्वेद में सोम, अश्वत्थ तथा पलाश वृक्षों की विशेष महिमा वर्णित है। कहा जाता है कि पलाश के वृक्ष में सृष्टि के प्रमुख देवता- ब्रह्मा, विष्णु और महेश का निवास है। पलाश का उपयोग ग्रहों की शांति हेतु भी किया जाता है। ज्योतिष शास्त्रों में ग्रहों के दोष निवारण हेतु पलाश के वृक्ष का भी महत्त्वपूर्ण स्थान माना जाता है। पलाश के वृक्ष पर त्रिदेवों के अलावा कुबेर और चंद्रमा आदि देवताओं का निवास माना जाता हैै। हिन्दू धर्म में इस वृक्ष का धार्मिक अनुष्ठानों में बहुत अधिक प्रयोग किया जाता है।
आयुर्वेद में
पलाश के अनेक गुण बताए गए हैं और इसके पाँचों अंगों-तना, जड़, फल, फूल और बीज से दवाएँ बनाने की विधियाँ दी गयी हैं। ये मधुमेह नाशक औषधि भी है। माना जाता है कि पलाश के रंग शरीर पर लगाने सेे काल कालसर्प दूर होता है। ‘लिंग पुराण’ में आता है कि पलाश की समिधा से ‘ॐ नमरू शिवाय’ मंत्र द्वारा 10 हजार आहुतियाँ दें तो सभी रोगों का शमन होता है ।
– पलाश का फूल उत्तर-प्रदेश का राज्य पुष्प है और इसको ‘भारतीय डाकतार विभाग’ द्वारा डाक टिकट पर प्रकाशित कर सम्मानित किया जा चुका है।
-प्राचीन काल से ही होली के रंग इसके फूलों से तैयार किये जाते रहे हैं।
-होली के लिए रंग बनाने के अलावा इसके फूलों को पीसकर चेहरे में लगाने से चमक बढ़ती है।
– पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इससे प्राप्त लकड़ी से यज्ञ संस्कार किया जाता था।
– इनके पुष्पों का उपयोग होली में रंग बनाने मे किया जाता हैं।
– इनकी पत्तियों का उपयोग दोने ओर पत्तल बनाने में किया जाता हैं। कुलमिलाकर इस पेड़ का मानव कल्याण में एक अच्छा योगदान हैं।
