मंगला गौरी व्रत में 16 का अंक माता पार्वती की 16 कलाओं और संपूर्ण सुहाग का प्रतीक है। यह व्रत पूरे भारत में प्रसिद्ध है, लेकिन उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश) और पश्चिमी भारत (महाराष्ट्र, गुजरात) में इसे सबसे अधिक निष्ठा के साथ रखा जाता है।


🌟 मंगला गौरी व्रत में ’16’ के अंक का महत्व

मंगला गौरी व्रत की पूजा में हर सामग्री (जैसे फूल, फल, पत्ते, सुहाग का सामान) 16 की संख्या में चढ़ाई जाती है। इसके पीछे गहरे धार्मिक और आध्यात्मिक कारण हैं:

  • माता पार्वती की 16 कलाएँ: हिंदू शास्त्र के अनुसार, देवी दुर्गा और माता पार्वती 16 कलाओं से पूर्ण हैं। 16 की संख्या में सामग्री अर्पित करना माता को उनकी पूर्णता के साथ पूजने का तरीका है।
  • सोलह श्रृंगार का प्रतीक: सुहागिन महिलाओं के लिए ‘सोलह श्रृंगार’ अखंड सौभाग्य और पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। इसलिए पूजा में 16 हरी चूड़ियाँ, 16 बिंदी और अन्य सुहाग सामग्री चढ़ाई जाती है।
  • 16 बत्तियों का दीपक: इस पूजा में आटे का एक विशेष दीपक बनाया जाता है जिसमें 16 बत्तियाँ जलाई जाती हैं। यह अंधकार को दूर कर जीवन में सुख-समृद्धि के प्रकाश का प्रतीक है। [1]
  • 16 लड्डू का भोग: पूजा के अंत में माता को आटे से बने 16 लड्डुओं का भोग लगाया जाता है, जिसे बाद में सुहागिन महिलाओं में बांट दिया जाता है।

🗺️ भारत में यह व्रत कहाँ सबसे ज्यादा रखा जाता है?

यद्यपि यह व्रत पूरे देश में मनाया जाता है, लेकिन इसके दो मुख्य केंद्र और अलग-अलग शैलियाँ हैं:

  • उत्तर भारत (बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और मध्य प्रदेश): यहाँ सावन के महीने में आने वाले सभी मंगलवार को यह व्रत बेहद लोकप्रिय है। विशेषकर नवविवाहित लड़कियाँ शादी के बाद पहले सावन से शुरू करके लगातार 5 वर्षों तक इस व्रत को अनिवार्य रूप से रखती हैं।
  • पश्चिमी भारत (महाराष्ट्र और गुजरात): यहाँ अमंत पंचांग (Amanta Calendar) के अनुसार श्रावण मास के मंगलवार को मंगला गौरी पूजा की जाती है। महाराष्ट्र में नवविवाहित महिलाएँ इस दिन रात भर जागकर पारंपरिक खेल (जैसे फुगड़ी) खेलती हैं और मंगला गौरी के गीत गाती हैं।

🪔 मंगला गौरी व्रत की संपूर्ण उद्यापन विधि (Udyapan Vidhi)

शादी के बाद लगातार 5 वर्षों तक (या इच्छा अनुसार 1 वर्ष) इस व्रत को रखने के बाद इसका उद्यापन यानी समापन करना जरूरी होता है, तभी व्रत का पूर्ण फल मिलता है। उद्यापन हमेशा सावन के अंतिम मंगलवार को किया जाता है।

[पंडित जी द्वारा होम-हवन] ➡️ [16 सुहागिनों को आमंत्रण] ➡️ [श्रृंगार व भोजन दान] ➡️ [सास का आशीर्वाद]
  1. कलश और चौकी स्थापना: उद्यापन के दिन सुबह जल्दी उठकर साफ कपड़े पहनें। पूजा स्थान पर एक रंगोली बनाएं और चौकी पर मंगल कलश स्थापित करें। माता मंगला गौरी की मूर्ति को नए वस्त्र और आभूषण पहनाएं।
  2. हवन और पूजा: एक सुयोग्य पंडित जी को बुलाकर विधि-विधान से पूजा करवाएं। हवन कुंड तैयार कर माता के मंत्रों से आहुति दें और आरती करें।
  3. 16 सुहागिनों का पूजन: उद्यापन में 16 सुहागिन महिलाओं (या अपनी क्षमता अनुसार) को घर पर आमंत्रित किया जाता है। पूजा संपन्न होने के बाद इन सभी महिलाओं को आदरपूर्वक भोजन कराया जाता है।
  4. सौभाग्य पिटारी (सुहाग दान): भोजन के बाद सभी 16 सुहागिनों को एक टोकरी या थैले में 16 श्रृंगार की वस्तुएं (जैसे साड़ी, चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, शीशा, कंघी आदि), फल और सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा रखकर दान दी जाती है।
  5. सास को विशेष भेंट: उद्यापन के अंत में व्रत रखने वाली महिला अपनी सास को एक बड़ी सौभाग्य पिटारी (जिसमें सोने या चांदी की कोई छोटी वस्तु, साड़ी और मिठाई हो) भेंट कर उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेती है।

By Pooja Patel

प्रोड्यूसर एंड सब एडिटर डेली हिन्दी मिलाप हैदराबाद, दैनिक भास्कर, नई दुनिया, भास्कर भूमि, राजस्थान पत्रिका में 14 वर्ष का कार्यानुभव

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