हरतालिका तीज व्रत 14 सितंबर 2026, सोमवार को रखा जा रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 13 सितंबर 2026 को सुबह 07:09 बजे से शुरू होकर 14 सितंबर 2026 को सुबह 07:07 बजे तक रहेगी। उदयातिथि की मान्यता के अनुसार अखंड सौभाग्य का यह महापर्व 14 सितंबर को ही मनाया जा रहा है, जिसमें सुबह पूजा का विशेष शुभ मुहूर्त 6:45 AM से 7:00 AM तक है।
यहाँ हरतालिका तीज की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा सामग्री, विधि और व्रत कथा की पूरी जानकारी दी गई है:
हरतालिका तीज 2026: जानें शुभ मुहूर्त, संपूर्ण पूजा विधि, सामग्री और पौराणिक व्रत कथा
पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य जीवन की कामना के लिए रखा जाने वाला सबसे कठिन व्रतों में से एक ‘हरतालिका तीज’ इस साल 14 सितंबर 2026 (सोमवार) को मनाया जा रहा है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए और कुंवारी कन्याएं मनचाहा वर पाने के लिए 24 घंटे का निराहार और निर्जला व्रत रखती हैं।
⏰ शुभ मुहूर्त और तिथि
पंचांग गणना के अनुसार, तृतीया तिथि की शुरुआत 13 सितंबर को सुबह 07:09 बजे हो रही है और इसका समापन 14 सितंबर को सुबह 07:07 बजे होगा।
- मुख्य व्रत तारीख: 14 सितंबर 2026 (उदयातिथि के अनुसार)
- सुबह की पूजा का उत्तम मुहूर्त: 14 सितंबर को सुबह 06:45 AM से 07:00 AM तक।
(नोट: कुछ क्षेत्रों व पारिवारिक परंपराओं में 13 सितंबर की शाम को प्रदोष काल में भी मुख्य पूजा की जा रही है।)
🛍️ संपूर्ण पूजा सामग्री लिस्ट (Puja Samagri)
हरतालिका तीज की पूजा के लिए इन सामग्रियों को पहले से एकत्रित कर लें:
- मूर्तियों के लिए: शुद्ध गीली काली मिट्टी या बालू रेत (शिव-पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा बनाने के लिए)।
- पूजा स्थल: लकड़ी की चौकी, लाल या पीला कपड़ा, और चौकी के चारों तरफ बांधने के लिए केले के पत्ते।
- कलश स्थापना: तांबे या मिट्टी का कलश, नारियल, पान के पत्ते, सुपारी, कलावा (मौली)।
- अभिषेक व अर्पण: गंगाजल, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर), चंदन, रोली, अक्षत (साबुत चावल), अबीर, इत्र और जनेऊ।
- शिव जी के प्रिय पत्र: बेलपत्र, धतूरा, शमी के पत्ते, फूल और फल।
- 16 श्रृंगार सामग्री (माता पार्वती के लिए): लाल चुनरी, सिंदूर, बिंदी, मेहंदी, चूड़ियां, बिछिया, काजल, कंघा, महावर (आलता) और शीशा।
🪔 पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)
हरतालिका तीज व्रत के नियम बेहद कड़े होते हैं। इसका पालन इस प्रकार किया जाता है:
- सुबह का संकल्प: व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और नए या साफ वस्त्र (हरा, लाल या पीला रंग शुभ माना जाता है) पहनकर व्रत का संकल्प लें। दिनभर पूरी तरह निर्जला (बिना पानी के) रहें।
- प्रतिमा निर्माण: शाम के समय (प्रदोष काल में) दोबारा स्नान कर दुल्हन की तरह 16 श्रृंगार करें। पवित्र मिट्टी या रेत से भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की सुंदर मूर्तियां बनाएं।
- चौकी सजाना: चौकी पर रंगीन कपड़ा बिछाकर मूर्तियों को स्थापित करें और कलश की स्थापना करें।
- पूजन अर्पण: सबसे पहले गणेश जी, फिर शिव जी और माता पार्वती की पूजा करें। भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा और जनेऊ चढ़ाएं। माता पार्वती को 16 श्रृंगार की पिटारी अर्पित करें।
- रात्रि जागरण और कथा: इस व्रत में रात को सोना वर्जित होता है। महिलाएं एकत्रित होकर रातभर भजन-कीर्तन (जागरण) करती हैं और हरतालिका तीज व्रत कथा सुनती हैं।
- पारणा (व्रत खोलना): अगले दिन सुबह आखिरी आरती के बाद माता पार्वती को सिंदूर ककड़ी या फल का भोग लगाएं और फिर जल पीकर व्रत का पारणा करें। इसके बाद मिट्टी की मूर्तियों का विसर्जन कर दें।
📖 पौराणिक व्रत कथा (Hartalika Teej Vrat Katha)
‘हरतालिका’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है — ‘हरत’ (हरण करना) और ‘आलिका’ (सखी/सहेली)। यह कथा खुद भगवान शिव ने माता पार्वती को उनके पिछले जन्म की याद दिलाने के लिए सुनाई थी:
माता पार्वती ने बचपन से ही भगवान शिव को अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया था। उन्हें पाने के लिए पार्वती जी ने हिमालय पर अन्न-जल त्याग कर हजारों वर्षों तक घोर तपस्या की। माता पार्वती की यह दशा देखकर उनके पिता पर्वतराज हिमालय अत्यंत दुखी थे। इसी बीच देवर्षि नारद ने आकर हिमालय राज से कहा कि भगवान विष्णु माता पार्वती से विवाह करना चाहते हैं, जिससे हिमालय राज सहर्ष तैयार हो गए।
जब माता पार्वती को पता चला कि उनका विवाह विष्णु जी से तय हो रहा है, तो वह अत्यंत दुखी हुईं क्योंकि वह मन से शिव जी को चुन चुकी थीं। उन्होंने अपनी व्यथा अपनी एक प्रिय सखी को बताई। तब उनकी सखी माता पार्वती को उनके पिता के घर से ‘हरकर’ (छिपकर) एक घने और सुरक्षित जंगल में ले गई।
जंगल में रहते हुए माता पार्वती ने नदी के तट पर रेत से शिवलिंग बनाया और निराहार-निर्जला रहकर कठोर तपस्या शुरू कर दी। भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन उनकी अटूट भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने पार्वती जी को पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। चूंकि सहेली द्वारा हरण करके इस व्रत की नींव पड़ी थी, इसीलिए इस पावन व्रत का नाम ‘हरतालिका तीज’ पड़ा।
