News desk| सावन के मंगलवार को रखा जाने वाला मंगला गौरी व्रत वर्ष 2026 में 4 अगस्त, 11 अगस्त, 18 अगस्त और 25 अगस्त को पड़ेगा। भगवान शिव के प्रिय महीने सावन में आने वाले सभी मंगलवार माता पार्वती के ‘मंगला गौरी’ स्वरूप की उपासना के लिए समर्पित होते हैं। यह व्रत मुख्य रूप से नवविवाहित और सुहागिन महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन की सुख-शांति और पति की लंबी उम्र के लिए रखती हैं।


🌸 मंगला गौरी व्रत का धार्मिक आधार और महत्व

धार्मिक दृष्टिकोण से सावन का पूरा महीना शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक है। जहाँ सोमवार का दिन भगवान भोलेनाथ को समर्पित है, वहीं मंगलवार का दिन आदिम शक्ति माता गौरी की पूजा के लिए तय किया गया है।

  • अखंड सुहाग की कामना: मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से सुहागिन महिलाओं के जीवन से वैवाहिक कष्ट दूर होते हैं और पति को दीर्घायु प्राप्त होती है।
  • विवाह की बाधाएं दूर होना: यदि किसी कन्या के विवाह में लगातार देरी या अड़चनें आ रही हों, तो इस उपवास को करने से योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।
  • कुंडली के दोषों का निवारण: यह व्रत वैवाहिक जीवन में आने वाले ‘मंगल दोष’ के नकारात्मक प्रभावों को कम करने में भी अत्यधिक असरदार माना जाता है।

📖 पौराणिक व्रत कथा (संक्षिप्त एवं सारगर्भित)

एक समय की बात है, एक धनी और धर्मपरायण व्यापारी के घर कई मन्नतें मांगने के बाद एक पुत्र का जन्म हुआ। परंतु, उस बालक की कुंडली में अल्पायु योग था; भविष्यवाणियों के अनुसार 16 वर्ष की आयु में सर्पदंश से उसकी मृत्यु निश्चित थी। व्यापारी ने नियति को स्वीकार करते हुए अपने पुत्र का विवाह एक ऐसी संस्कारी कन्या से कराया, जिसकी माता वर्षों से पूरी निष्ठा के साथ ‘मंगला गौरी व्रत’ करती आ रही थीं।

उस कन्या की माता के इस कठिन तप और व्रत के प्रभाव से उनकी पुत्री को कभी न मिटने वाले अखंड सौभाग्य का आशीष प्राप्त था। विवाह के बाद जब वह बालक 16 वर्ष का हुआ, तो काल (सर्प) उसकी जान लेने आया, लेकिन कन्या के सौभाग्य के तेज के सामने वह निष्प्रभावी हो गया और बालक को नया जीवन मिला। इसी दिव्य चमत्कार के बाद से समाज में इस व्रत को रखने और पूजने की परंपरा शुरू हुई।


🪔 पूजन की प्रामाणिक और सरल विधि

मंगला गौरी की पूजा में ’16’ के अंक का विशेष नियम होता है, क्योंकि माता पार्वती को सोलह कलाओं का प्रतीक माना जाता है।

[पवित्र स्नान व संकल्प] ➡️ [चौकी पर माता की स्थापना] ➡️ [16 बत्तियों का दीपदान] ➡️ [कथा श्रवण व आरती]
  1. सुबह का संकल्प: व्रत के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ लाल, पीले या नारंगी रंग के वस्त्र धारण करें। इसके बाद हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
  2. पूजा स्थल की तैयारी: घर के उत्तर-पूर्व कोने (ईशान कोण) को साफ करके एक लकड़ी की चौकी रखें। उस पर साफ लाल कपड़ा बिछाकर माता पार्वती की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
  3. 16 का विशेष अर्पण: माता गौरी के सामने पूजा की सभी सामग्रियां 16 की संख्या में रखें। इसमें 16 जोड़ी हरी चूड़ियां, 16 प्रकार के पत्ते (बेलपत्र, दूर्वा आदि), 16 फूल, 16 फल और सुहाग का सामान (बिंदी, सिंदूर, अलता, मेहंदी) शामिल होना चाहिए।
  4. विशेष आटे का दीपक: आटे का एक बड़ा दीपक तैयार करें, जिसमें 16 बत्तियां रखी जा सकें। इस दीपक को शुद्ध गाय के घी से प्रज्वलित करें।
  5. कथा और भोग: माता के सामने बैठकर व्रत कथा का पाठ करें। भोग में आटे से बने 16 लड्डू अर्पित करें। पूजा संपन्न होने के बाद आरती करें और यह प्रसाद अन्य सुहागिन महिलाओं में बांट दें।
  6. भोजन का नियम: इस व्रत में अन्न का सेवन वर्जित होता है। व्रत रखने वाली महिला को दिन में केवल एक बार बिना नमक का फलाहारी या सात्विक भोजन करना चाहिए।

By Pooja Patel

प्रोड्यूसर एंड सब एडिटर डेली हिन्दी मिलाप हैदराबाद, दैनिक भास्कर, नई दुनिया, भास्कर भूमि, राजस्थान पत्रिका में 14 वर्ष का कार्यानुभव

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