देशभर में लगातार बढ़ रहे आवारा कुत्तों के हमलों और रेबीज के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि सड़कों पर घूम रहे हिंसक कुत्तों से आम नागरिकों की सुरक्षा करना स्थानीय प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। कोर्ट ने इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए मानवीय दृष्टिकोण के साथ-साथ कड़े प्रशासनिक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट के फैसले की 4 बड़ी बातें
- नागरिकों की सुरक्षा पहली प्राथमिकता: अदालत ने टिप्पणी की कि हर नागरिक को बिना किसी डर के सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर घूमने का मौलिक अधिकार है। आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों के कारण इस अधिकार का हनन नहीं होना चाहिए।
- हिंसक और बीमार कुत्तों पर कड़ा रुख: कोर्ट ने कहा कि जो आवारा कुत्ते अत्यधिक आक्रामक हो चुके हैं या रेबीज जैसी लाइलाज और संक्रामक बीमारियों से पीड़ित हैं, उन्हें चिन्हित किया जाए। ऐसे कुत्तों को कानून के दायरे में रहकर दर्दमुक्त मौत (Euthanasia) देने पर विचार किया जा सकता है।
- बजट और नसबंदी का आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और नगर निगमों को निर्देश दिया है कि वे आवारा कुत्तों की नसबंदी (Sterilization) और एंटी-रेबीज टीकाकरण के लिए अलग से बजट आवंटित करें और इस प्रक्रिया में तेजी लाएं।
- फीडिंग जोन तय करने के निर्देश: आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वाले पशु प्रेमियों (Animal Lovers) के लिए कोर्ट ने कहा कि स्थानीय प्रशासन को विशिष्ट ‘फीडिंग जोन’ तय करने चाहिए, ताकि रिहायशी इलाकों या सोसायटियों के मुख्य रास्तों पर लोगों को असुविधा न हो।
🚨 प्रशासन की जवाबदेही होगी तय
अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि स्थानीय निकाय (Municipal Corporations) केवल कागजों पर काम न करें। अगर किसी इलाके में आवारा कुत्तों के काटने से कोई गंभीर हादसा या मौत होती है, तो इसके लिए संबंधित क्षेत्र के अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी। इसके साथ ही पीड़ितों को उचित मुआवजा देने की व्यवस्था पर भी जोर दिया गया है।
क्या होगा इस फैसले का असर?
इस ऐतिहासिक आदेश के बाद अब नगर निगमों और नगर पालिकाओं को अपने-अपने क्षेत्रों में आवारा कुत्तों की गणना करने और उनके पुनर्वास के लिए शेल्टर होम बनाने के काम में तेजी लानी होगी। इससे सड़कों पर पैदल चलने वाले बच्चों, बुजुर्गों और टू-व्हीलर चालकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
