News Desk| भक्त माता कर्मा की कहानी भक्ति की शक्ति को दर्शाती है जहाँ नियम पीछे छूट जाते हैं और केवल प्रेम बचता है। इस साल यानी 2026 में, भक्त माता कर्मा की जयंती मुख्य रूप से 15 मार्च 2026 (रविवार) को मनाई जाएगी।
माता कर्मा की जयंती हर साल पापमोचिनी एकादशी के दिन मनाई जाती है। उनके जीवन की एक छोटी और प्रभावशाली कहानी यहाँ दी गई है:
भक्ति की सरल राह
माता कर्मा (कर्माबाई) का जन्म राजस्थान के नागौर जिले के कालवा गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनके हृदय में श्री कृष्ण (ठाकुर जी) के बाल रूप के प्रति गहरा अनुराग था। वे ठाकुर जी से बिल्कुल वैसे ही बातें करती थीं, जैसे कोई माँ अपने छोटे बालक से करती है।
खिचड़ी का वह अनोखा भोग
एक बार जब उनके पिता किसी कार्यवश बाहर गए, तो उन्होंने कर्मा को ठाकुर जी को भोग लगाने का दायित्व सौंपा। कर्मा ने बड़े प्रेम से बाजरे की खिचड़ी बनाई और प्रभु के सम्मुख रख दी। वे इस सरल विश्वास में थीं कि भगवान साक्षात् आकर उसे ग्रहण करेंगे।
जब काफी समय बीत जाने पर भी भगवान प्रकट नहीं हुए, तो कर्मा की आँखों में आँसू आ गए। वे दुखी होकर कहने लगीं, “प्रभु, अगर आप नहीं खाएंगे तो मैं भी भूखी रहूँगी।” उनकी ऐसी निश्छल और हठी भक्ति को देखकर भगवान स्वयं बालक के रूप में प्रकट हुए और बड़े चाव से वह सादी खिचड़ी खाई।
सामाजिक संदेश और विरासत
माता कर्मा केवल एक भक्त ही नहीं, बल्कि एक समाज सुधारक भी थीं। उन्होंने अस्पृश्यता और रूढ़िवादिता जैसी सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठाई और समाज में एकता का संदेश दिया।
आज भी जगन्नाथ पुरी के मंदिर में सुबह के समय भगवान को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है, जिसे ‘कर्माबाई की खिचड़ी’ के नाम से जाना जाता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि ईश्वर को पाने के लिए किसी कठिन कर्मकांड की नहीं, बल्कि केवल सच्चे भाव की आवश्यकता है।
