रायपुर। सनातन परंपरा में अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का महापर्व पितृ पक्ष (पितर पाख) शुरू हो चुका है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, इन 16 दिनों में हमारे पूर्वज सूक्ष्म रूप में धरती पर आते हैं और अपने वंशजों द्वारा किए गए तर्पण व श्राद्ध को स्वीकार करते हैं। छत्तीसगढ़ में इस पर्व को केवल धार्मिक कर्मकांड के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत लोक-संस्कृति के रूप में मनाया जाता है, जिसे स्थानीय बोली में ‘पितर बैसकी’ और विदाई के दिन को ‘पितर खेदा’ कहा जाता है。 [1, 2]
छत्तीसगढ़ी अंचल में पितरों के स्वागत के लिए घर के मुख्य द्वार पर पीढ़ा, लोटा, चौक और दातून रखने की एक बेहद अनूठी और प्राचीन परंपरा है। आइए जानते हैं इस लोक-परंपरा का महत्व, श्राद्ध की सरल विधि और इस दौरान ध्यान रखने योग्य जरूरी बातें। [1, 2]
छत्तीसगढ़ में पितर पाख की अनूठी परंपरा: क्यों रखा जाता है पीढ़ा, लोटा, चौक और दातून?
छत्तीसगढ़ी संस्कृति में अतिथि देवो भवः की भावना कूट-कूट कर भरी है। जब घर में पूर्वज (पितर) आते हैं, तो उनका स्वागत एक सम्मानित अतिथि की तरह किया जाता है। अंचल के ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में रोज़ सुबह स्नान के बाद घर के मुख्य द्वार (देहरी) पर इन सामग्रियों को सजाया जाता है, जिसका गहरा आध्यात्मिक महत्व है: [1]
- आटे का सुंदर चौक: घर की देहरी पर सबसे पहले आटे या चावल पिसे घोल (चौक) से सुंदर अल्पना बनाई जाती है। यह इस बात का प्रतीक है कि घर शुद्ध है और हम पूरे आदर के साथ अपने पूर्वजों का स्वागत कर रहे हैं। [1, 2]
- लकड़ी का पीढ़ा (आसन): चौक के ऊपर लकड़ी का एक छोटा पीढ़ा (पटरा या आसन) रखा जाता है। मान्यता है कि लंबी यात्रा तय करके आ रहे पितर इस आसन पर विश्राम करते हैं। [1]
- पानी का लोटा: पीढ़े के पास तांबे या कांसे के लोटे में साफ पानी भरकर रखा जाता है। यह पितरों के पैर धोने और उनकी प्यास बुझाने के लिए होता है। [1]
- दातून (कोश दुबी/तरुई): लोटे के साथ नीम या करंज की दातून (दांत साफ करने की लकड़ी) रखी जाती है। कई जगहों पर दातून के साथ कुशा (कोश दुबी) या तरोई (तोरई) के पत्ते भी रखे जाते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि सुबह उठकर पितर सबसे पहले मुख शुद्धि (दातून) करें। [1, 2, 3]
छत्तीसगढ़ में माना जाता है कि इन सामग्रियों को देखने के बाद पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं और घर के भीतर प्रवेश कर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। [1, 2]
श्राद्ध और तर्पण की सरल पूजा विधि
यदि आप घर पर ही अपने पितरों का श्राद्ध कर रहे हैं, तो दोपहर के समय (कुतुप या रोहिण मुहूर्त) इसे संपन्न करें: [1, 2]
- तर्पण की विधि: सुबह स्नान करके साफ (संभव हो तो सफेद) वस्त्र पहनें। एक तांबे या चांदी के पात्र में शुद्ध जल लें। उसमें काले तिल, जौ, कच्चा दूध और गंगाजल मिलाएं। हाथ की अनामिका उंगली में कुशा की अंगूठी (पवित्री) पहनकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों का ध्यान करते हुए जल अर्पित (तर्पण) करें। [1, 2, 3, 4, 5]
- भोजन अर्पण व पंचबलि: पितरों की मृत्यु तिथि पर सात्विक भोजन (जैसे छत्तीसगढ़ी परंपरा में उड़द दाल का बड़ा, सुहारी, खीर और पुरखों की पसंद का भोजन) बनाएं। भोजन का पहला अंश अग्रि को दें, इसके बाद गाय, कौआ, कुत्ता और चींटियों (पंचबलि) के लिए ग्रास निकालें। मान्यता है कि कौए के रूप में पितर स्वयं भोजन ग्रहण करते हैं। [1, 2, 3]
- ब्राह्मण भोज और दान: इसके बाद किसी योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद को आदरपूर्वक भोजन कराएं, वस्त्र व दक्षिणा दान करें। [1, 2]
पितृ पक्ष में किन बातों का विशेष ध्यान रखें (नियम व सावधानियां)?
पितृ पक्ष के 16 दिनों को बेहद संवेदनशील और संयम का समय माना जाता है। इस दौरान इन गलतियों से बचना चाहिए: [1, 2]
- सात्विक जीवन: घर में पूरी तरह सात्विकता बनाए रखें। भोजन में प्याज़, लहसुन, मांस और मदिरा का प्रयोग भूलकर भी न करें।
- शारीरिक संयम: श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को इन दिनों बाल, दाढ़ी और नाखून काटने से बचना चाहिए। साथ ही ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- लोहे के बर्तनों का निषेध: पितरों की पूजा या भोजन पकाने में लोहे के बर्तनों का उपयोग नहीं करना चाहिए। पीतल, तांबा या मिट्टी के बर्तन उत्तम माने जाते हैं।
- शुभ कार्यों पर रोक: इस अवधि में गृह प्रवेश, मुंडन, विवाह या कोई भी नया कीमती सामान (जैसे गाड़ी, सोना) खरीदने से बचना चाहिए। यह शोक और कृतज्ञता व्यक्त करने का समय है। [1, 2, 3, 4]
