नई दिल्ली/काशी:
हिंदू सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इन 15 दिनों में हमारे पूर्वज (पितर) पृथ्वी लोक पर आते हैं और अपने वंशजों द्वारा दिए गए अन्न-जल को ग्रहण करते हैं। परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और वंश वृद्धि के लिए पितरों का आशीर्वाद बेहद जरूरी माना गया है। आइए जानते हैं श्राद्ध से जुड़ी सभी जरूरी बातें, नियम और भोजन की सही विधि।
श्राद्ध क्यों जरूरी है और क्यों आवश्यक है पितरों का आशीर्वाद?
शास्त्रों के अनुसार, हमारे पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनकी तृप्ति के लिए श्राद्ध कर्म किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि पितरों के प्रसन्न होने से घर में चल रही परेशानियां, जैसे संतान सुख में बाधा, धन की कमी और गृह क्लेश दूर होते हैं। परिवार के हर सदस्य को सुखी जीवन जीने के लिए पितरों के आशीर्वाद की अत्यधिक आवश्यकता होती है, क्योंकि पितरों की नाराजगी से कुंडली में ‘पितृ दोष’ लगता है।
किस-किस को करना चाहिए तर्पण? क्या हर सदस्य को करना जरूरी है?
- मुख्य नियम: शास्त्रों के अनुसार, परिवार के मुख्य मुखिया, बड़े पुत्र या सबसे छोटे पुत्र को मुख्य रूप से श्राद्ध और तर्पण करना चाहिए।
- क्या हर सदस्य कर सकता है?: परिवार के अन्य सदस्य भी पितरों के प्रति कृतज्ञता जताने के लिए मानसिक रूप से उनका ध्यान कर सकते हैं और हाथ जोड़कर प्रार्थना कर सकते हैं। हालांकि, मुख्य पिंड दान और तर्पण का कार्य एक ही व्यक्ति (मुख्य कर्ता) द्वारा किया जाना शास्त्र सम्मत है।
- विशेष परिस्थिति: यदि परिवार में कोई पुत्र न हो, तो भाई, भतीजा, नाती या स्वयं पत्नी और बेटियां भी पितरों का श्राद्ध और तर्पण कर सकती हैं।
तर्पण और श्राद्ध की सही विधि
- समय: श्राद्ध हमेशा दोपहर के समय (कुतुप काल) किया जाता है। सुबह या शाम को श्राद्ध कर्म वर्जित है।
- दिशा व सामग्री: दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। तांबे के पात्र में साफ जल, गंगाजल, कच्चा दूध, जौ, काले तिल और कुशा (घास) लें।
- विधि: हाथों में कुशा धारण करके जल की अंजलि लें और अंगूठे की ओर से (पितृ तीर्थ) जल अर्पित करें। अपने पूर्वजों का नाम लेते हुए उनसे तृप्त होने की प्रार्थना करें।
श्राद्ध का विशेष भोजन: क्या बनाएं?
पितरों की तृप्ति के लिए शुद्ध और सात्विक भोजन बनाया जाता है:
- मुख्य पकवान: इस दिन खीर और पूरी बनाना सबसे अनिवार्य माना गया है।
- सब्जियां व दाल: उड़द की दाल के बड़े, कढ़ी और सात्विक सब्जियां (जैसे कद्दू या तोरई) बनाई जाती हैं।
- इनका प्रयोग न करें: भोजन में लहसुन, प्याज, मसूर की दाल और तीखे मसालों का प्रयोग पूरी तरह वर्जित है।
- पंचबली भोग: ब्राह्मण भोजन से पहले भोजन का अंश गाय, कुत्ते, कौवे, चींटियों और देवताओं के लिए निकाला जाता है।
ब्राह्मण दान: क्या-क्या देना चाहिए?
श्राद्ध कर्म के बाद ब्राह्मणों को आदरपूर्वक भोजन कराकर दान दिया जाता है:
- सीधा दान (अनाज): कच्चा राशन जिसमें चावल, गेहूं का आटा, दाल, घी और नमक शामिल हो।
- वस्त्र व वस्तुएं: सामर्थ्य के अनुसार धोती, कुर्ता या गमछा दान करें। इसके अलावा छाता और जूते-चप्पल का दान भी राहु-केतु दोषों को शांत करता है।
- दक्षिणा: दान को पूर्ण करने के लिए कुछ नकद राशि (दक्षिणा) अवश्य दें, क्योंकि इसके बिना दान अधूरा माना जाता है।
