; छत्तीसगढ़ी हथकरघा को दिया बढ़ावा, शुरू हुआ नया विवाद
विशेष संवाददाता, रायपुर
18 अगस्त 2026
रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आयोजित राज्य स्तरीय बुनकर सम्मेलन और राष्ट्रीय हथकरघा दिवस कार्यक्रम के दौरान एक बेहद अनोखा और ऐतिहासिक नजारा देखने को मिला। कभी बस्तर के घने जंगलों में सुरक्षाबलों के खिलाफ बंदूकें तानने वाली 9 पूर्व महिला माओवादियों ने इस बार हाथों में हथियार नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति को थाम रखा था। हरी वर्दी छोड़ पारंपरिक छत्तीसगढ़ी हथकरघा और कोसा सिल्क से बने खूबसूरत परिधानों में सजी इन महिलाओं ने जब पेशेवर मॉडल्स के साथ रैंप पर कदम रखे, तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
इस कार्यक्रम में प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय भी मौजूद थे, जिन्होंने इन महिलाओं से मुलाकात कर उनका हौसला बढ़ाया। मुख्यधारा में लौटीं इन महिलाओं में से 8 सुकमा और 1 बीजापुर क्षेत्र की रहने वाली हैं, जो फिलहाल सुकमा के सरकारी पुनर्वास केंद्र में नई जिंदगी की शुरुआत कर रही हैं।
जंगल की हिंसा से फैशन के मंच तक का सफर
मुख्यधारा में शामिल होने का यह अनुभव इन महिलाओं के लिए बिल्कुल नया और भावुक करने वाला था। रैंप वॉक का हिस्सा रहीं एक 28 वर्षीय पूर्व माओवादी महिला ने बताया, “हमने जंगल की जिंदगी में कभी ऐसा कुछ नहीं देखा था। हालांकि, माओवादी संगठन के सांस्कृतिक विंग (चेतना नाट्य मंच) में काम करने के कारण हमें मंच पर प्रस्तुति देने का थोड़ा अनुभव था, जिसने हमें रैंप पर आत्मविश्वास से चलने में मदद की।” अधिकारियों के मुताबिक, इन महिलाओं को इस खास शो के लिए मुंबई से आए पेशेवर विशेषज्ञों द्वारा 7 दिनों तक रैंप वॉक, ग्रूमिंग, पहनावे और आत्मविश्वास से बात करने की विशेष ट्रेनिंग दी गई थी।
सरकार की पुनर्वास नीति की बड़ी कामयाबी
प्रशासन और केंद्र सरकार इस कदम को अपनी आत्मसमर्पण-सह-पुनर्वास (Surrender-cum-Rehabilitation) नीतियों की एक बड़ी सफलता के तौर पर पेश कर रहे हैं। बस्तर को उग्रवाद से मुक्त करने और भटके हुए युवाओं को रोजगार, वित्तीय सहायता और व्यावसायिक प्रशिक्षण देकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में इसे ‘नये भारत’ और ‘बदलते बस्तर’ की एक खूबसूरत तस्वीर बताया जा रहा है।
सिलाई के नाम पर धोखे का आरोप: शो के बाद गहराया विवाद
शानदार प्रस्तुति और सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद, अब इस पूरे मामले को लेकर एक नया विवाद भी खड़ा हो गया है। मीडिया रिपोर्ट्स और ‘द वायर’ के मुताबिक, कार्यक्रम के बाद कुछ पूर्व माओवादी महिलाओं ने आरोप लगाया है कि उनके साथ धोखा हुआ है।
महिलाओं का कहना है कि उन्हें सुकमा पुनर्वास केंद्र से सिलाई कढ़ाई का प्रशिक्षण देने के बहाने रायपुर लाया गया था। रायपुर पहुंचने के बाद उन्हें बताया गया कि उन्हें फैशन शो का हिस्सा बनना है और रैंप वॉक की ट्रेनिंग दी जाने लगी। इस कथित धोखे और सहमति के बिना किए गए इस आयोजन को लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और स्थानीय स्तर पर सरकार की आलोचना भी शुरू हो गई है।
फिलहाल, जहां एक तरफ बस्तर की महिलाओं का बंदूक छोड़कर रंग-बिरंगे कपड़ों में रैंप पर उतरना राज्य के बदलते सामाजिक परिदृश्य को दिखाता है, वहीं दूसरी तरफ इस आयोजन के पीछे के प्रशासनिक तौर-तरीकों पर उठे सवालों ने इस गौरवशाली पल के पीछे की राजनीति को गरमा दिया है।
