भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश में बढ़ती नकदी की मांग और नोटों की छपाई पर होने वाले भारी खर्च से निपटने के लिए एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है। बिजनेस स्टैंडर्ड (Business Standard) की एक रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय बैंक ने अपने करीब एक दशक पुराने पॉलीमर (प्लास्टिक) नोट जारी करने के प्रस्ताव को दोबारा हरी झंडी दे दी है। हाल ही में पटना और मुंबई में आयोजित आरबीआई की केंद्रीय बोर्ड बैठकों में इस योजना पर बेहद गंभीर चर्चा हुई है।
इस नई योजना के तहत आरबीआई जल्द ही आम जनता के बीच उपयोग के लिए प्लास्टिक नोटों का एक पायलट प्रोजेक्ट (परीक्षण) लॉन्च कर सकता है। शुरुआत में कम मूल्यवर्ग के नोटों, जैसे ₹10 और ₹20 के नोटों का परीक्षण किया जाएगा, क्योंकि दैनिक जीवन में अत्यधिक लेनदेन के कारण ये नोट बहुत जल्दी फट और खराब हो जाते हैं।
परीक्षण के पीछे के 3 सबसे बड़े कारण:
- बढ़ता छपाई खर्च: वित्तीय वर्ष 2024-25 में नोटों की छपाई की लागत बढ़कर ₹6,372.8 करोड़ पहुंच गई, जो पिछले साल ₹5,101.4 करोड़ थी। प्लास्टिक नोट आने से बार-बार नोट छापने का खर्च घटेगा।
- खराब नोटों का अंबार: केवल वित्त वर्ष 2025 में ही बाजार से 23.8 अरब कटे-फटे और मैले (soiled) नोटों को नष्ट किया गया। प्लास्टिक नोटों की लाइफ सामान्य कागज के नोटों से 3 से 4 गुना अधिक लंबी होती है।
- एटीएम (ATM) तकनीक में सुधार: इससे पहले साल 2012 में भी केंद्र सरकार ने 5 शहरों में ₹10 के पॉलीमर नोटों का फील्ड ट्रायल मंजूर किया था, लेकिन तब एटीएम मशीनों की तकनीकी दिक्कतों के कारण इसे टालना पड़ा था। अब नई आधुनिक तकनीक की वजह से एटीएम मशीनें इन नोटों को आसानी से पहचान और निकाल सकेंगी।
यदि यह परीक्षण सफल रहता है, तो भारत भी ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा और सिंगापुर जैसे उन 60 से अधिक देशों की कतार में शामिल हो जाएगा जहां प्लास्टिक करेंसी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है।
