न्यूज डेस्क। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध साग भाजी में एक नाम हे लाकड़ी, जेकर साग सब ला मिठाथे। ठंडी के दिन में बाजार में एकर भाजी 100 रुपया किलो तक बेचाथे, तभो माई पिला मन एला खाए बर नहीं छोड़े काबर के एकर स्वादे अलग आय होथे।
लाकड़ी, तिवरा के नाम से जानी जाने वाली लाकड़ी भाजी भारत के अन्य राज्यों में खेसारी, गा्रस पी, तेवड़ा और, लतरी, लखौड़ी के नाम से जानी जाती है। लोगों इसकी लोकप्रियता ऐसी है कि कभी सरकार को इसके ज्यादा सेवन पर प्रतिबंध भी लगाना पड़ गया था। गरीबों की भाजी और दाल के नाम से जानी जाने वाली लाकड़ी गरीबों की हांडी की दाल, रोटी और साग का प्रमुख अंग हुआ करती थी। इसके बाद भी लाकड़ी के स्वाद का हर कोई दीवाना है।
छत्तीसगढ़ में लोकप्रियता
छत्तीसगढ़ में इसका उत्पादन भी अन्य राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा होता है। छत्तीसगढ़ में लगभग 2.5 लाख हेक्टेयर में इसकी खेती होती है और उत्पादन करीब 12.5 लाख क्विंटल है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, असम, बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में इसकी खेती खूब होती है। ये खेती असींचित इलाकों और काली मिट्टी वाले खेतों में होती है।
छत्तीसगढ़ चुनाव-2023 में कांग्रेस पार्टी ने अपनी घोषणा पत्र में लाकड़ी दाल पर एमएसपी यानि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीदी का वादा किया था, पर कांग्रेस की सरकार नहीं आ पाई और लाकड़ी किसानों का सपना अधूरा रह गया।
आयरन, प्रोटीन, कैल्शियम
लाकड़ी भाजी एक हरी पत्तेदार सब्जी है, जो मुख्य रूप से सर्दियों में खाई जाती है, इसे लहसुन, सूखी लाल मिर्च और उड़द, मूंग की दाल की बड़ियों के साथ बनाया जाता है। छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का एक अहम हिस्सा है।
पोषक तत्वों की बात करें तो इसमें आयरन और कैल्शियम भरपूर होता है। कुछ लोग इसे पथरी के लिए भी सहायक मानते हैं। विटामिन ए और सी जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व पाए जाते हैं।
लाकड़ी पौष्टिक दलहनी तो है ही लेकिन इसमें न्यूरोटॉक्सिन और कुछ जहरीले एसिड पाया जाता है, जो व्यक्ति को लकवा ग्रस्त कर देती है। इसके ज्यादा सेवन से व्यक्ति विकलांग हो सकता है।
लकवाग्रस्त कर सकती है लाकड़ी
आपको बता दें कि लाकड़ी की खेती पर 1961 में प्रतिबंध लगा दिया गया था, क्योंकि इससे लोगों में लैथिरिजम या कलायखंज की बीमारी हो रही थी। जिसमें लोगों के कमर के नीचे के अंग काम करना बंद कर देते हैं। लैथिरिजम शब्द खेसारी के वैज्ञानिक नाम लैथाइरस सैटाइवस से ही बना है। गरीबों की दाल के नाम में प्रसिद्ध लाकड़ी की दाल ही अंग्रेजों के जमाने में गरीबों को काम के बदले दी जाती थी। हर गरीब अपनी थाली में इसी दाल और साग का सेवन करता था।
1983 में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए फैसला लिया था कि मजदूरी के बदले लाकड़ी की दाल नहीं दी जाएगी।
हालांकि अब इसकी नई किस्में आ गई हैं जिन्हें रतन या प्रतीक लाकड़ी किस्म के नाम से जाना जाता है। इसकी खेती को फिर से बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन फिर भी इसके अधिक सेवन से म लकवा या गठिया जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
माना कि लाकड़ी की दाल में 31 प्रतिशत प्रोटीन की मात्रा होती है. लाकड़ी की दाल में अलग-अलग जातियों में विषैले ओडीएपी की मात्रा 0.15 से 0.35 प्रतिशत तक रहती है। रतन में ये 0.06 प्रतिशत, प्रतीक में 0.08 प्रतिशत और महातिवड़ा में 0.07 प्रतिशत जिनमें विषैले ओडीएपी की मात्रा कम है। इसलिए कहा गया है अति सर्वत्र वर्जयेत। खाए जरूर, लेकिन स्वाद के लिए इसे रोज भोजन की थाली का हिस्सा न बनाएं।
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