न्यूज डेस्क। गणपति पक्ष पर पूरे छत्तीसगढ़ सहित दक्षिण एवं मध्य भारत में भगवान गणेश की बड़े आव भगत के साथ पूजा की जा रही है। बड़ी-बड़ी मूर्तियों और पंडालों की खूबसूरती हर जगह देखते बन रही है। भगवान गणेश के दर्शन के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु पंडालों पर पहुंच रहे हैं।
गणेश पक्ष को सनातन धर्म में प्रथम देवता भगवान गणेश की अराधना का पर्व माना जाता है। भगवान गणेश जन्मोत्सव के अवसर पर मनाया जाने वाले इस पर्व की शुरुआत दक्षिण भारत में भगवान कार्तिकेय के क्षेत्र में भगवान गणेश के आव भगत और सत्कार के शुरु की गई थी जो आज घर-घर तक व्यापक हो चुकी है।
इन सभी खूबसूरत आयोजनों में कुछ खटक रहा है तो वह है भगवान गणेश की मूर्ति के साथ किया जाने वाला व्यंगात्मक प्रयास जो कि पूर्ण रूप से निंदनीय है।
दुर्ग-भिलाई, राजनांदगांव, रायपुर में गणेश पक्ष के अवसर पर कई सारे पंडाल लगे हुए हैं, लेकिन कुछ पंडालों में भगवान गणेश की मूर्ति को अलग ही रूप में स्थापित किया गया है। ऐसे प्रयास सनातन धर्म और वैदिक नियमों के विरूद्ध हैं। एक ओर जहां यहीं पंडालों की समितियां सनातन के अपमान पर एक जुट होकर कुछ भी कर गुजरने को तैयार होती हैं। वह खुद ही भगवान को अभिनेता, बंजारे, कृष्ण, क्यूट, एआई मूर्ति तो कहीं मोटर साइकिल, बाहुबली, बजरंगबली के रूप में स्थापित कर किस तरह की दैवीय पूजा शैली का उदाहरण देना चाहती है समझ से परे है!
समझ से परे यह भी है कि खुलेआम आराध्य भगवान गणेश के इस अपमान पर वह सभी हिन्दू समितियां भी चुप बैठी हैं जो सनातन धर्म के अपमान पर विरोध करने मोर्चा निकाल कर प्रदर्शन करती हैं। प्रथम पूज्य आराध्य देवता भगवान गणेश पर क्या इस तरह के एक्सपैरीमेंट शोभा देते हैं! सोशल मीडिया पर कुछ पाॅडकास्ट वायरल हो रहे हैं जिसमें फलां मूर्तिकार इसे अपनी मजबूरी बता रहे हैं। क्या इन मूर्तिकारों की अपनी जिम्मेदारी नहीं है कि वह इस तरह की मूर्तियों को बनाने से साफ मना करें। धन के प्रलोभन में मूर्तिकार भी एआई और क्यूट मूर्तियों के नाम पर देवी-देवताओं का अपमान कर रहे हैं।
पंडालों के नाम पर व्यापार कर रही समितियों को भी क्या यह समझना नहीं चाहिए कि यह उत्सव है, कोई व्यापार नहीं जहां आप 50 से 100 रुपए की टिकट लगाकर अपने आयोजनों का प्रदर्शन कर रहे हैं और प्रमोटरों के एड लगाकर लाखों कमां रहे हैं।
यूं तो आप मंदिरों में लगने वाले वीआईपी दर्शनों पर आरोप लगाते हैं। क्या पंडालों के इस वीआईपी कल्चर पर रोक लगाने का कोई नियम लागू नहीं हैं। प्रशासन जो माटी गणेश के नाम पर कार्यक्रम चलाती है वह इन आयोजनों में चुप क्यों रहती है जहां पंडाल अपनी मनमानी चलाते हैं और आराध्य को प्रयोगशाला का प्रयोग समझ बैठते हैं। सवाल उन तमाम हिन्दू परिषदों से भी हैं कि क्यों यह सब देख कर वह आंखें मंूदे बैठे रहते हैं।
इसके बाद बात आती है डीजे की जहां शराब में लतपथ युवा फिल्मी गानों में नाचता विर्सजन यात्रा निकालता है और फिर जब नदी और तालाबों में दुर्घटनाएं होती हैं तो शुरू हो जाता है प्रशासन को कोसने का दौर। क्या यहां नैतिक जिम्मेदारी आम जनता की भी नहीं है। पंडाल में 10 दिन भगवान को गणेश को पूजने वाले कैसे भूल जाते हैं कि विसर्जन के नाम पर शराब पीकर किया जा रहा उनका हुडदंग कैसे प्रथम पूज्य को स्वीकार होगा। क्या ये हिन्दू धर्म और सनातन का अपमान नहीं है।
जिम्मेदारी समझिए, आराध्य को आराध्य रहने दीजिए। तन और मन की पवित्रता बनाए रखिए। अपने धर्म का सम्मान करिए न कि उसे उपहास का केंद्र बनाइए। धरती और पर्यावरण का सम्मान कर आयोजनों को योगदान दीजिए। तभी मंगलमूर्ति की पूजा से हमारा असली मंगल हो पाएगा।
