नई दिल्ली / लखनऊ / रायपुर:
देशभर में आज 29 अक्टूबर 2026 को सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य का महापर्व करवा चौथ मना रही हैं। हालांकि, बंगाल की खाड़ी से उठे चक्रवाती तूफान ‘अर्नब’ (Cyclone Arnab) के कारण मौसम का मिजाज पूरी तरह बदल गया है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, इस चक्रवात के प्रभाव से तटीय राज्यों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश (UP) और छत्तीसगढ़ में भी मौसम में भारी तब्दीली आई है।
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल, मध्य यूपी और बुंडेलखंड के कई जिलों में आज सुबह से ही ठंडी हवाओं के साथ घने बादल छाए हुए हैं और कुछ स्थानों पर हल्की से मध्यम बारिश हो रही है। वहीं, छत्तीसगढ़ के बस्तर, रायपुर और बिलासपुर संभाग में भी चक्रवात के असर से आसमान पूरी तरह बादलों से पटा हुआ है और रुक-रुक कर रिमझिम फुहारें पड़ रही हैं। मौसम विभाग का अनुमान है कि आज रात (करीब 8:12 से 8:17 बजे के बीच) होने वाले चंद्रोदय के समय यूपी और छत्तीसगढ़ के अधिकांश हिस्सों में प्रत्यक्ष चंद्र दर्शन होने की संभावना बेहद कम है।
ऐसे में निर्जला व्रत रख रहीं करोड़ों व्रती सुहागिनों के मन में यह चिंता है कि यदि चांद दिखाई न दिया, तो व्रत का पारण (व्रत खोलना) कैसे करें? इस संकट के समाधान के लिए ज्योतिषाचार्यों ने स्कंद पुराण, नारद पुराण और निर्णयसिंधु जैसे प्रामाणिक शास्त्रों के काल-खंडों का हवाला देते हुए विशेष पूजा विधियों का उल्लेख किया है, जिससे व्रत पूर्ण रूप से सफल माना जाएगा।
शास्त्रों का प्रमाण: किस काल-खंड और अध्याय में क्या है विधान?
जब प्राकृतिक बाधाओं के कारण प्रत्यक्ष देवता अदृश्य हों, तो हिंदू धर्म ग्रंथ पूर्णतः व्यावहारिक और वैज्ञानिक मार्ग दिखाते हैं:
- स्कंद पुराण (नागर खंड – कार्तिक माहाatmya):
- काल-खंड व संदर्भ: स्कंद पुराण के अंतर्गत ‘नागर खंड’ में समाहित ‘कार्तिक माहात्म्य’ के अध्यायों में करक चतुर्थी (करवा चौथ) के व्रत का मूल विधान है।
- शास्त्र सम्मत नियम: इस खंड में स्पष्ट निर्देश है कि यदि कोई प्राकृतिक आपदा (जैसे चक्रवात या भारी वर्षा) आड़े आए और प्रत्यक्ष दर्शन संभव न हो, तो व्रती को ‘मानसिक आवाहन’ (Mental Invocation) करना चाहिए। ईश्वर दृश्यता से अधिक व्रती के संकल्प और मानसिक भाव को स्वीकार करते हैं।
- नारद पुराण (पूर्व भाग – चतुर्थ पाद):
- काल-खंड व संदर्भ: नारद पुराण के ‘पूर्व भाग’ के ‘चतुर्थ पाद’ के अंतर्गत आने वाले तिथिनिर्णय अध्यायों (अध्याय 110-120 के मध्य) में सभी मुख्य व्रतों का उल्लेख है।
- शास्त्र सम्मत नियम: इसमें संकट काल के लिए ‘प्रतीक पूजा’ का विधान दिया गया है। शास्त्र का सूत्र है कि मुख्य वस्तु के अभाव में उसके प्रतिनिधि (प्रतीक) की पूजा उतनी ही फलदायी है। इसके अनुसार, चांदी या चावल को चंद्रदेव का रूप मानकर पूजा की जा सकती है।
- निर्णयसिंधु (द्वितीय परिच्छेद – व्रत काल निर्णय खंड):
- काल-खंड व संदर्भ: 17वीं शताब्दी के महान ग्रंथ ‘निर्णयसिंधु’ के ‘द्वितीय परिच्छेद’ (व्रत परिच्छेद खंड) में व्रतों के समय आने वाले विघ्नों पर विस्तृत काल-निर्णय दिया गया है।
- शास्त्र सम्मत नियम: ग्रंथ के अनुसार, व्रत की पूर्णता ‘गणित-सिद्ध काल’ (पंचांग द्वारा गणना किए गए सटीक समय) पर निर्भर करती है, न कि मौसम की अनुकूलता पर। यदि बादल चांद को छुपा लें, तो पंचांग के सटीक चंद्रोदय समय पर उस दिशा में मुख करके अर्घ्य देने से व्रत दोषमुक्त और पूर्ण माना जाता है।
