वॉशिंगटन से इस्लामाबाद तक मचा हड़कंप
इस्लामाबाद/वॉशिंगटन:
पाकिस्तान एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में है, लेकिन इस बार वजह कोई आर्थिक मदद नहीं बल्कि एक ‘गुप्त सैन्य समझौता’ बताया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय रक्षा गलियारों में यह खबर आग की तरह फैल रही है कि पाकिस्तान ने ईरान के कुछ महत्वपूर्ण सैन्य और टोही विमानों को अपने एयरबेस पर छिपने की जगह दी है।
क्या है पूरा विवाद?
खबरों के अनुसार, मध्य-पूर्व में बढ़ते युद्ध के खतरों के बीच ईरान ने अपनी वायुसेना के चुनिंदा विमानों को सुरक्षित रखने के लिए पाकिस्तान के ‘नूर खान एयरबेस’ का इस्तेमाल किया है। दावा किया जा रहा है कि यह सब तब हुआ जब पाकिस्तान दुनिया के सामने ईरान और अमेरिका के बीच सुलह कराने वाले ‘शांतिदूत’ की भूमिका निभा रहा था।
पाकिस्तान की दोहरी रणनीति पर सवाल
यदि ये दावे सच साबित होते हैं, तो यह पाकिस्तान की विदेश नीति पर बड़ा सवालिया निशान होगा। विश्लेषकों का मानना है कि एक तरफ अमेरिका से आर्थिक इमदाद की उम्मीद रखना और दूसरी तरफ अमेरिका के कट्टर दुश्मन ईरान के सैन्य विमानों को पनाह देना, पाकिस्तान को भारी पड़ सकता है।
अमेरिका की तीखी नज़र
वॉशिंगटन ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि वह स्थिति पर बारीकी से नजर रख रहा है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि अगर पाकिस्तान ने वास्तव में ईरान की सैन्य मदद की है, तो उसे मिलने वाली वैश्विक सहायता और कर्जों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
इस्लामाबाद का पक्ष: ‘दावे बेबुनियाद’
वहीं, पाकिस्तान ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। पाकिस्तानी रक्षा मंत्रालय का कहना है कि ये खबरें केवल प्रोपेगेंडा हैं और किसी भी विदेशी सैन्य विमान को गुप्त तरीके से पनाह नहीं दी गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि नूर खान एयरबेस जैसे व्यस्त ठिकाने पर कुछ भी छिपाना संभव नहीं है।
आगे क्या होगा?
यह विवाद आने वाले दिनों में और गहरा सकता है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय सैटेलाइट एजेंसियां अब इन दावों की पुष्टि के लिए पाकिस्तान के एयरबेसों की तस्वीरों का विश्लेषण कर रही हैं। अगर सबूत सामने आते हैं, तो पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्तों में एक बड़ी दरार आ सकती है।
