इस्लामाबाद/कराची:
पाकिस्तान इस वक्त अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है, जहाँ सिर्फ अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि आम जनता का मानसिक संतुलन भी चरमराता दिख रहा है। हालिया अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय स्वास्थ्य रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान की लगभग 35% से 40% आबादी गंभीर मानसिक तनाव, डिप्रेशन और एंग्जायटी का शिकार हो चुकी है।
महंगाई और बेरोजगारी ने छीनी मानसिक शांति
विशेषज्ञों का मानना है कि आसमान छूती महंगाई, बिजली के भारी-भरकम बिल और बेरोजगारी ने आम आदमी को ‘कलेक्टिव ट्रॉमा’ (सामूहिक मानसिक आघात) की स्थिति में धकेल दिया है। पाकिस्तान में हर दिन औसतन 15 से 35 लोग आर्थिक तंगी और भविष्य की अनिश्चितता के कारण आत्महत्या जैसा घातक कदम उठा रहे हैं। सड़कों पर बढ़ता गुस्सा और बढ़ते हिंसक अपराध इसी ‘मेंटल ब्रेकडाउन’ का नतीजा माने जा रहे हैं।
संसाधनों का अकाल: 24 करोड़ जनता और मुट्ठी भर डॉक्टर
आंकड़े डराने वाले हैं—पाकिस्तान की 24 करोड़ से ज्यादा की आबादी के लिए केवल 500 के करीब प्रमाणित साइकेट्रिस्ट मौजूद हैं। यानी लाखों लोगों पर केवल एक डॉक्टर उपलब्ध है। सरकारी अस्पतालों में मानसिक रोगों के लिए बजट नाममात्र (कुल बजट का 0.5% से कम) है, और बाजार से जरूरी दवाएं भी गायब हैं।
सियासी खींचतान और ‘मेंटल टॉर्चर’
सिर्फ आम जनता ही नहीं, पाकिस्तान की सत्ता के गलियारों में भी ‘मानसिक स्वास्थ्य’ चर्चा का विषय बना हुआ है। जहां सेना ने पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को ‘मानसिक रूप से अस्थिर’ करार दिया, वहीं विपक्ष ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध और ‘मेंटल टॉर्चर’ का नाम दिया है। इस राजनीतिक अस्थिरता ने आम नागरिकों में असुरक्षा की भावना को और बढ़ा दिया है।
नई चुनौती: ‘दिमाग खाने वाला’ अमीबा
मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ कराची जैसे शहरों में Naegleria fowleri (ब्रेन-ईटिंग अमीबा) का खौफ भी फैला है, जो दूषित पानी के जरिए दिमाग पर हमला कर रहा है। इसने स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है।
निष्कर्ष:
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि अगर पाकिस्तान ने अपनी स्वास्थ्य नीतियों में तत्काल सुधार नहीं किया और आर्थिक स्थिरता नहीं आई, तो यह मानसिक संकट एक बड़ी मानवीय त्रासदी में बदल सकता है।
