अयोध्या:
प्रभु श्री राम की नगरी अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण कार्य अपने अगले और अंतिम चरणों की ओर बढ़ रहा है। 22 जनवरी को हुई ‘प्राण प्रतिष्ठा’ के बाद से ही मंदिर परिसर में चल रहे काम की गति और मजदूरों की उपस्थिति को लेकर कई चर्चाएं हो रही हैं। ताज़ा जानकारी के अनुसार, निर्माण स्थल पर काम करने वाले मजदूरों की संख्या में पहले के मुकाबले कमी देखी गई है।

मजदूरों के जाने के पीछे के मुख्य कारण:

1. पहले चरण के लक्ष्यों की प्राप्ति:
मंदिर के भूतल (Ground Floor) और गर्भगृह का मुख्य निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। प्राण प्रतिष्ठा से पहले दिन-रात काम चल रहा था जिसके लिए भारी संख्या में शारीरिक श्रम (Labour) की आवश्यकता थी। अब वह चरण पूरा होने के बाद, अतिरिक्त मजदूरों को नियमानुसार रिलीव किया गया है।

2. सामान्य मजदूरी बनाम नक्काशी का काम:
शुरुआती दौर में नींव भरने और पत्थर ढोने के लिए सामान्य मजदूरों की जरूरत ज्यादा थी। अब मंदिर के प्रथम और द्वितीय तल पर बारीक़ नक्काशी और फिनिशिंग का काम चल रहा है। इसके लिए साधारण मजदूरों के बजाय विशेष शिल्पकारों और पत्थर तराशने वाले कारीगरों की आवश्यकता बढ़ गई है, जिससे कुल संख्या में अंतर दिख रहा है।

3. अन्य प्रोजेक्ट्स में शिफ्टिंग:
निर्माण कंपनी (लार्सन एंड टुब्रो) के पास देश भर में कई बड़े प्रोजेक्ट्स चलते हैं। राम मंदिर का मुख्य ढांचा खड़ा होने के बाद, कंपनी ने अपने अनुबंध के आधार पर कुछ लेबर फोर्स को दूसरे महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर शिफ्ट कर दिया है।

4. भीषण गर्मी और स्थानीय पलायन:
उत्तर भारत में बढ़ती तपिश और लू के कारण भी दोपहर के समय काम की शिफ्ट में बदलाव किया गया है। कुछ अस्थायी मजदूर कटाई के सीजन या निजी कारणों से अपने गांवों की ओर लौटे हैं, जो हर बड़े प्रोजेक्ट के दौरान एक सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है।

ट्रस्ट का रुख:

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अनुसार, मंदिर निर्माण की समयसीमा में कोई बदलाव नहीं है। 2024 के अंत तक मंदिर के अन्य हिस्सों को पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। मजदूरों की संख्या में कमी काम रुकने का संकेत नहीं, बल्कि ‘वर्कफोर्स ऑप्टिमाइजेशन’ (काम के अनुसार बदलाव) का हिस्सा है।


By Pooja Patel

प्रोड्यूसर एंड सब एडिटर डेली हिन्दी मिलाप हैदराबाद, दैनिक भास्कर, नई दुनिया, भास्कर भूमि, राजस्थान पत्रिका में 14 वर्ष का कार्यानुभव

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