रायपुर/
छत्तीसगढ़ की माटी अपनी अनूठी परंपराओं के लिए दुनिया भर में मशहूर है। इसी कड़ी में आगामी 20 अप्रैल 2026 को प्रदेश भर में ‘अक्ति’ (अक्षय तृतीया) का पर्व पारंपरिक हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। इस दिन की सबसे रोचक विशेषता है—‘पुतरा-पुतरी बिहाव’। यह केवल बच्चों का खेल नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है, जो पीढ़ियों से चला आ रहा है।
क्या है पुतरा-पुतरी बिहाव?
अक्षय तृतीया के ‘अबूझ मुहूर्त’ पर छत्तीसगढ़ के गांवों और शहरों में बच्चे मिट्टी और लकड़ी से बने गुड्डा (पुतरा) और गुड़िया (पुतरी) का विवाह रचाते हैं। इस विवाह में वे सभी रस्में निभाई जाती हैं जो एक वास्तविक छत्तीसगढ़ी शादी में होती हैं।
- चुलमाटी और तेल-हल्दी: बकायदा मंडप (मड़वा) गाड़ा जाता है और गुड्डा-गुड़िया को हल्दी चढ़ाई जाती है।
- बारात और परघौनी: लड़के पक्ष के बच्चे बारात लेकर निकलते हैं, जिनका स्वागत लड़की पक्ष के बच्चे ‘परघौनी’ और फूलों के साथ करते हैं।
- दहेज में मिट्टी के बर्तन: दुल्हन बनी गुड़िया को विदा करते समय मिट्टी के छोटे बर्तन, खिलौने और सामग्रियां उपहार स्वरूप दी जाती हैं।
सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व
बुजुर्गों का मानना है कि इस परंपरा के जरिए नई पीढ़ी को अपने सामाजिक संस्कारों और विवाह की बारीकियों से जोड़ा जाता है। साथ ही, यह मान्यता भी है कि जिन घरों में पुतरा-पुतरी का विवाह संपन्न होता है, वहां असली शादियों में आने वाली बाधाएं दूर हो जाती हैं।
किसानों के लिए नई शुरुआत
अक्ति का दिन छत्तीसगढ़ी किसानों के लिए ‘बीज पुटनी’ का दिन भी होता है। इस दिन किसान अपने खेतों में जाकर प्रतीकात्मक रूप से बीज बोते हैं और अच्छी फसल के लिए धरती माता की पूजा करते हैं। मान्यता है कि इसी दिन से नए कृषि वर्ष का आगाज होता है।
2026 का शुभ मुहूर्त
ज्योतिष गणना के अनुसार, इस वर्ष अक्षय तृतीया 20 अप्रैल (सोमवार) को पड़ रही है। इस दिन सुबह से ही बाजारों में मिट्टी के खिलौने और बर्तनों की रौनक बढ़ जाएगी। प्रदेश के कई हिस्सों में इस दिन ‘बासी’ खाने और सत्तू व मिट्टी के घड़ों के दान की भी विशेष परंपरा निभाई जाएगी।
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