सनातनी एकता का पर्याय है भंडारा,सनातन को जोड़ने का कार्य कीजिए तोड़ने का नहीं


चुरू। पंडित प्रदीप मिश्रा ने अपने शिवपुराण कथा में आज भंडारे को लेकर लोगों को जागरूक किया। उन्होंने सोशल मीडिया में भंडारे के प्रसाद को लेकर फैलाई जा रही भ्रांतियों को लोगों से न मानने की अपील की।
इन दिनों पंडित प्रदीप मिश्रा की शिवपुराण कथा राजस्थान के चुरु जिले में चल रही है। चुरू जिले से उन्होंने आज भंडारे को लेकर एक बड़ी बात कही है। उन्होंने कहा कि आज कल सोशल मीडिया में ट्रेंड बन गया है हर कोई यही कहते फिर रहा है कि भंडारे का प्रसाद मत खाना पुण्य क्षय हो जाएगा। उन्होंने ऐसी बातों को सनातन को तोड़ने वाला करार दिया।


भाग्यवान होता है भंडारा खाने वाला
उन्होंने कहा कि महाभारत का चरित्र कहता है कि जिसकी जिंदगी में कोई पुण्य प्रबल होता है वह भंडारा कराता है। जिसने कोई अच्छा कर्म किया होता है जिससे वह भंडारा कराता है। उन्होंने कहा कि भंडारे का प्रसाद खाने वाले का भी पुण्य प्रबल होता है। उसने भी कोई अच्छा कर्म किया होता है इसीलिए उसके भाग्य में भंडारे का प्रसाद आता है।


सनातनी एकता का पर्याय है भंडारा
पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा कि सनातन को जोड़ने का कार्य कीजिए तोड़ने का नहीं। यदि आपने कोई अच्छा पुण्य किया है तभी आप भंडारे की लाइन में लगते हैं नहीं तो किसी दारू की दुकान में लाइन लगाते। भंडारे खाने वाला व्यक्ति अपना अहंकार छोड़कर जमीन में बैठकर खाना खाता है। एक करोड़पति व्यक्ति अपना अहंकार छोड़कर भंडारे के प्रसाद को हाथ फैलाकर खाता है। उन्होंने कहा कि यह हमारी सनातनी एकता का पर्याय है। आजकल महाराजों ने अपने-अपने प्रवचनों में कहना चालू कर दिया है हम उनसे पूछना चाहते हैं कि क्या उन्होंने अपने जीवन में कभी भंडारा नहीं खाया! प्रवचन देने से पहले खुद पर अमल करना चाहिए।


महाभारत चरित्र में भंडारे की कथा
पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा महाभारत चरित्र कहता है है कि जब पांडवों ने यज्ञ की रचना कि तो एक घंटा लगाया था। उनकी यज्ञशाला का घंटा नहीं बज रहा था। पूछा गया कि घंटा क्यों नहीं बज रहा तो ब्राह्म्णों ने बताया कि भंडारे में कोई भूखा रह गया होगा। पूरी हस्तिनापुर नगरी को छाना गया तो पता चला कि झोपड़ी में एक संत रहते हैं जिन्होंने भंडारा नहीं खाया है। भीम और युद्धिष्ठीर ने जाकर संत से भंडारे खाने का आग्रह किया। संत ने कहा कि वह भंडारे का भोजन करना चाहते थे, परंतु उन्हें इसके लिए पुण्य चाहिए। संत ने कहा कि उन्हें 1008 अश्वमेद्य यज्ञ का पुण्य चाहिए। इस पर दौपदी ने संत से कहा कि महाराज कहा जाता है कि यदि आप अपने घर से संत के द्वार तक जितने कदम पैदल जाते हैं उतने कदमों की संख्या को अश्वमेद्य यज्ञ का पुण्य माना जाता है। कृपा करके इसे स्वीकार करे और भंडारे का भोजन करें। तब संत ने उनका भंडारे का भोजन स्वीकार किया और उनकी यज्ञशाला का घंटा बजा।

जितनी मर्जी भंडारा खाओ
पंडित प्रदीप मिश्रा ने आगे कहा कि आजकल एक नया ट्रेंड आ गया है। हर व्यक्ति अपने प्रवचन में कहता है कि भंडारा मत खाना पाप लग जाएगा। प्याज खा जाना पाप नहीं लगेगा। लोगों की प्रापर्टी खा जाना पाप नहीं लगेगा। फिर किसी ने कहा लोगों के पास न जाने कैसा-कैसा धन आ जाता है। उसका भाग खाते हो। अगर गलत धन आता तो वह भंडारा नहीं कराता। किटी पार्टी मना रहा होता। अगर गलत धन आता तो उसका धन होटल बीयर या मांसाहार में लगता। उसका धन अच्छा तभी तो भंडारे में लगा और तुम्हारा कर्म अच्छा था तभी तुम्हें भंडारे का प्रसाद मिला। यह भंडारा नहीं हमारे सनातन धर्म की एकता को दर्शाता है। भंडारें पर खाने से व्यक्ति का अहंकार छूट जाता है। बड़ा से बड़ा व्यक्ति भी जमीन में बैठकर मांगकर खाता है। बड़ा-बड़ा करोड़पति व्यक्ति भी जब हाथ फैलाकर प्रसाद लेता है तो परमात्मा उसकी झोली खुशियों से भर देते हैं। एक ने प्रवचन में यह कह दिया दूसरे ने यह कह दिया। शिवपुराण कहता है किसी का दिल मत दुखाओ। गलत चीज मत खाओ। जितनी मर्जी भंडारा खाओ। भगवान से प्रार्थना करो आज यह भंडारा करा रहा है। कल मैं भी भंडारा करा सकूं।

By Pooja Patel

प्रोड्यूसर एंड सब एडिटर डेली हिन्दी मिलाप हैदराबाद, दैनिक भास्कर, नई दुनिया, भास्कर भूमि, राजस्थान पत्रिका में 14 वर्ष का कार्यानुभव

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