Dhanteras Puja Vidhi As Per Puranas: दिवाली (Diwali) के पांच दिवसीय महापर्व की शुरुआत धनतेरस से होती है। सनातन परंपरा में इस दिन को बेहद पवित्र माना गया है। अमूमन लोग धनतेरस को सिर्फ सोना, चांदी या बर्तन खरीदने का त्योहार मानते हैं, लेकिन शास्त्रों में इसका महत्व इससे कहीं अधिक गहरा है।
शास्त्रों के अनुसार, धनतेरस का वास्तविक नाम ‘धनत्रयोदशी’ है। इसका सीधा संबंध भौतिक धन-दौलत से ज्यादा, ‘स्वास्थ्य रूपी धन’ और परिवार की ‘अकाल मृत्यु से सुरक्षा’ से है। आइए जानते हैं कि इस दिन की पूजा को लेकर विभिन्न पुराणों में क्या लिखा है और शास्त्रों के अनुसार इसकी सही पूजा विधि क्या है।
किस पुराण में क्या लिखा है? (Historical & Mythological Importance)
हिंदू धर्म के प्रमुख पुराणों में इस विशेष दिन का विस्तृत वर्णन मिलता है:
- विष्णु पुराण (प्रथम अंश, 9वां अध्याय): विष्णु पुराण के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के बीच अमृत के लिए समुद्र मंथन हो रहा था, तब कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए थे। वे भगवान विष्णु के ही अंशावतार हैं, जिन्हें आयुर्वेद का जनक और देवताओं का वैद्य माना जाता है। यही कारण है कि इस दिन को धन्वंतरि जयंती या आरोग्य उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
- पद्म पुराण: पद्म पुराण में धनतेरस के दिन ‘यम दीपदान’ का विशेष उल्लेख है। इसके अनुसार, जो व्यक्ति इस दिन सूर्यास्त के बाद यमराज के निमित्त दीपदान करता है, उसके परिवार पर मंडरा रहा अकाल मृत्यु (समय से पहले मौत) का साया हमेशा के लिए टल जाता है।
शास्त्रों के अनुसार धनतेरस की प्रामाणिक पूजा विधि (Step-by-Step Puja Vidhi)
धनतेरस की मुख्य पूजा हमेशा प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में की जानी चाहिए। यदि आप शास्त्रों के अनुसार पूजा करना चाहते हैं, तो इन चरणों का पालन करें:
1. पूजा की तैयारी और संकल्प
सबसे पहले स्नान कर साफ पीले, लाल या सफेद वस्त्र धारण करें। घर के उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) या पूर्व दिशा में एक लकड़ी की चौकी स्थापित करें। उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और गंगाजल छिड़क कर स्थान को शुद्ध करें। हाथ में अक्षत (चावल), फूल और जल लेकर पूजा का संकल्प लें।
2. देवताओं की स्थापना
चौकी पर भगवान गणेश, माता लक्ष्मी, भगवान धन्वंतरि और धन के देवता कुबेर जी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। ध्यान रखें कि शास्त्रों के अनुसार श्रीगणेश हमेशा लक्ष्मी जी के दाहिने ओर होने चाहिए। पास में ही एक तांबे या पीतल के कलश में जल भरकर रखें, जिस पर आम के पत्ते और नारियल हो। यह कलश धन्वंतरि देव का प्रतीक माना जाता है। यदि आपने कोई नया बर्तन या चांदी का सिक्का खरीदा है, तो उसे भी धोकर चौकी के पास रखें।
3. मुख्य षोडशोपचार पूजा
- गणेश जी: सबसे पहले गणपति जी को तिलक लगाएं, दूर्वा, अक्षत और फूल अर्पित करें।
- भगवान धन्वंतरि: धन्वंतरि देव को पीले फूल, पीला चंदन, हल्दी और धूप-दीप अर्पित करें। उन्हें औषधियां (जैसे तुलसी, गिलोय या फल) या सात्विक नैवेद्य चढ़ाएं।
- लक्ष्मी जी और कुबेर देव: माता लक्ष्मी को रोली, कुमकुम, कमल का फूल और खील-बताशे अर्पित करें। कुबेर जी को सफेद मिठाई का भोग लगाएं। खरीदी गई वस्तुओं और सिक्कों पर भी हल्दी-कुमकुम का तिलक अवश्य लगाएं।
4. मंत्र जाप और आरती
पूजा के दौरान धन्वंतरि मंत्र: “ॐ रं रूद्र रोगनाशाय धन्वन्तरये नमः” और लक्ष्मी मंत्र: “ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः” का शांत मन से जाप करें। इसके बाद सभी देवी-देवताओं की धूप-दीप से आरती करें और प्रसाद वितरण करें।
5. सबसे महत्वपूर्ण चरण: ‘यम दीपदान’
मुख्य पूजा संपन्न होने के बाद, आटे या मिट्टी का एक बड़ा चौमुखी (चार बत्तियों वाला) दीपक लें। उसमें सरसों का तेल भरें और एक सिक्का व एक कौड़ी डालें। इस दीपक को घर के अंदर नहीं जलाना है। इसे जलता हुआ लेकर घर के मुख्य द्वार पर आएं और दक्षिण दिशा (South)की तरफ मुख करके रख दें। दीपक रखते समय यमराज से अपने परिवार की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करें। इसके बाद घर के अन्य हिस्सों में कुल 13 दीये जलाएं।
