विशेष ब्यूरो, नई दिल्ली:
सनातन धर्म में मां दुर्गा के कई अलौकिक रूपों की कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन उनमें से एक ऐसा रूप भी है जिसका प्राकट्य ऋषियों और मनुष्यों के आंसुओं को पोंछने और पूरी सृष्टि की भूख मिटाने के लिए हुआ था। आज हम आपको बताने जा रहे हैं ‘मां शाकंभरी’ (Maa Shakambhari) की वह पावन कथा, जिसे महर्षि वेदव्यास ने देवी भागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण (दुर्गा सप्तशती) में लिपिबद्ध किया था।


1. दुर्गमासुर का आतंक और 100 साल का भीषण सूखा

पौराणिक काल में महिषासुर नाम के एक इच्छाधारी और महाक्रूर असुर का आतंक था, जिसका जन्म असुरराज रंभ और एक शापित राजकुमारी (जो भैंस रूपी महिषी बन चुकी थी) के मिलन से हुआ था। मां दुर्गा ने 9 दिनों के महायुद्ध के बाद दशमी तिथि को महिषासुर का वध किया था।

महिषासुर के वध के बाद, उसके वंश में ‘दुर्गमासुर’ नाम का एक और भयानक राक्षस हुआ। उसने भगवान ब्रह्मा की तपस्या करके चारों वेदों को चुरा लिया और पाताल में छिपा दिया। वेदों के लुप्त होने से धरती से मंत्र, यज्ञ और धर्म पूरी तरह समाप्त हो गए। इसका परिणाम यह हुआ कि देवताओं की शक्ति क्षीण हो गई और धरती पर लगातार 100 वर्षों तक भीषण अकाल और सूखा पड़ा। पानी की एक-एक बूंद और अन्न के दाने के लिए त्राहि-त्राहि मच गई।

2. जब 9 दिनों तक बहे मां के आंसू (मां ‘शताक्षी’)

जब समस्त जीव और ऋषि-मुनि भूख-प्यास से व्याकुल होकर हिमालय की कंदराओं में छिप गए, तब उन्होंने रोते हुए जगदम्बा को पुकारा। ऋषियों की करुण पुकार सुनकर मां भगवती प्रकट हुईं।

सृष्टि की ऐसी दुर्दशा देखकर ममतामयी माता का हृदय कांप उठा और उनके शरीर पर अचानक 100 नेत्र (आँखें) प्रकट हो गए। अपने बच्चों का दुख देखकर मां की आँखों से लगातार नौ दिनों तक आंसुओं की मूसलाधार वर्षा होती रही। मां के इन दिव्य आंसुओं से सूखी नदियाँ, तालाब और समुद्र फिर से पानी से लबालब भर गए और धरती का सूखा समाप्त हो गया। 100 आँखों से ऋषियों को देखने के कारण माता का नाम ‘शताक्षी’ पड़ा।

3. शरीर से अन्न प्रकट कर बनीं ‘शाकंभरी’, दुर्गमासुर का वध कर कहलाईं ‘दुर्गा’

सूखा खत्म होने के बाद भी जीवों की भूख मिटाना बाकी था। तब दयामयी माता ने अपने शरीर से अनगिनत प्रकार की हरी सब्जियां (शाक), जड़ी-बूटियाँ, फल, मूल और अन्न प्रकट किए, जिससे पूरी सृष्टि का पेट भरा। शाक और वनस्पतियों को धारण करने और उनसे संसार का भरण-पोषण करने के कारण माता का नाम हमेशा के लिए ‘शाकंभरी’ पड़ गया।

इसके बाद देवताओं को उनका वैभव वापस दिलाने के लिए माता ने उस क्रूर राक्षस ‘दुर्गमासुर’ पर आक्रमण किया और एक भीषण युद्ध में उसका वध कर दिया। दुर्गम नामक महादैत्य का संहार करने के कारण ही माता का नाम ‘दुर्गा’ प्रसिद्ध हुआ।


उत्तर भारत का ऐतिहासिक सिद्धपीठ: मां शाकंभरी देवी मंदिर (सहारनपुर)

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले की शिवालिक पहाड़ियों के बीच माता का सबसे प्रमुख और प्राचीन सिद्धपीठ स्थित है। इस ऐतिहासिक मंदिर से जुड़ी खास बातें इस प्रकार हैं:

  • आदि शंकराचार्य का आगमन: मान्यता है कि इस प्राचीन क्षेत्र से विग्रहों को खोजकर महान जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी ने ही मंदिर के गर्भगृह में विधि-विधान से पुनर्स्थापित किया था।
  • चार स्वरूपों के दर्शन: इस भव्य दरबार में मां शाकंभरी देवी के साथ-साथ मां शताक्षी, मां भीमा और मां भ्रामरी के पावन विग्रह स्थापित हैं।
  • बाबा भूरा देव (भैरव) की अनोखी परंपरा: मुख्य मंदिर से 1 किलोमीटर पहले माता के रक्षक ‘बाबा भूरा देव’ का मंदिर है। प्राचीन परंपरा के अनुसार, जो भक्त पहले भूरा देव के दर्शन नहीं करता, उसकी शाकंभरी देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है।

सहारनपुर जिला प्रशासन द्वारा हर साल शारदीय और चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर भव्य शाकंभरी देवी मेले का आयोजन किया जाता है, जहाँ देश के कोने-कोने (हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, दिल्ली) से लाखों की संख्या में श्रद्धालु माता का आशीर्वाद लेने पहुँचते हैं।

By Pooja Patel

प्रोड्यूसर एंड सब एडिटर डेली हिन्दी मिलाप हैदराबाद, दैनिक भास्कर, नई दुनिया, भास्कर भूमि, राजस्थान पत्रिका में 14 वर्ष का कार्यानुभव

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