दुर्ग।
चक्रवात अर्नब के कारण हुई मूसलाधार बारिश और शिवनाथ नदी के उफान ने दुर्ग शहर को टापू में तब्दील कर दिया है। लेकिन पिछले 5 दिनों से सड़कों पर बह रहा पानी सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि नगर निगम, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (T&CP) और भू-माफियाओं के बीच पनपे गहरे भ्रष्टाचार का कड़वा सच बयां कर रहा है। आज शहर की जनता यह पूछ रही है कि जब डूबान क्षेत्रों में धड़ल्ले से अवैध प्लॉटिंग हो रही थी, तब जिम्मेदार अधिकारी किस गहरी नींद में सोए थे?
खोखले साबित हुए मानसून के इंतजाम, राहत कार्य में भी देरी
हर साल मानसून से पहले नगर निगम नालों की सफाई और ड्रेनेज सिस्टम दुरुस्त करने के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपए का बजट कागजों पर साफ कर देता है। इस बार की बारिश ने इन दावों की पूरी तरह हवा निकाल दी। शहर के मुख्य नाले कचरे और अवैध निर्माणों से चोक मिले। जब लोगों के घरों में 4 से 5 फीट तक पानी घुस गया, तब जाकर प्रशासन की नींद टूटी। हालांकि, बाद में एसडीआरएफ (SDRF) और नगर सेना की टीमों ने मोर्चा संभालकर 400 से अधिक लोगों का रेस्क्यू किया, लेकिन तब तक लोगों का लाखों रुपए का सामान तबाह हो चुका था।
टाउन एंड कंट्री प्लानिंग की सबसे बड़ी लापरवाही: गायब हो गए प्राकृतिक नाले
शहर के मास्टर प्लान को ताक पर रखकर टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग ने बिना किसी वाटर-मॉडलिंग के निचले इलाकों और तालाबों के कैचमेंट एरिया में धड़ाधड़ कमर्शियल और आवासीय प्रोजेक्ट्स को एनओसी (NOC) बांट दी। पैसे के रसूख के आगे नियमों को इस कदर बौना कर दिया गया कि जो पुराने प्राकृतिक नाले शहर के पानी को बाहर निकालते थे, उन पर अवैध प्लाटिंग कर बहुमंजिला इमारतें तान दी गईं। शहर का दायरा तो बढ़ा, लेकिन पानी निकासी के रास्ते बंद कर दिए गए।
पुलगांव और महाराजा चौक के डूबने की इनसाइड स्टोरी
- पुलगांव चौक का संकट: यह इलाका शिवनाथ नदी और पुलगांव नाले के बेहद करीब है। मोंगरा जलाशय से पानी छोड़े जाने के बाद नदी का जलस्तर बढ़ने से नाले का पानी आगे जाने के बजाए बैक मारने लगा। वहीं, महाराजा चौक से पुलगांव चौक के बीच चल रहे सड़क चौड़ीकरण के कारण ड्रेनेज सिस्टम पहले से ही ब्लॉक था, जिससे यह पूरा व्यावसायिक हब जलमग्न हो गया।
- महाराजा चौक की बदहाली: इस प्रमुख जंक्शन पर पोटिया और आसपास के निचले इलाकों का पानी आकर जमा होता है। यहाँ चल रहे सड़क निर्माण के दौरान ठेकेदारों ने लापरवाही बरतते हुए मिट्टी को सड़कों पर ही छोड़ दिया, जिसने नालियों को पूरी तरह चोक कर दिया। इस भारी जलभराव को बाहर निकालने के लिए कोई बड़ा आउटलेट नाला न होना टाउन प्लानिंग की सबसे बड़ी विफलता है।
जनता का तीखा सवाल: जब कट रहे थे प्लॉट, तब क्यों मौन था निगम?
आज पीड़ित जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर है। लोगों का सीधा आरोप है कि भ्रष्टाचार के चलते जानबूझकर इन क्षेत्रों को “डूबान क्षेत्र” (Flood Zone) घोषित नहीं किया गया। अगर निगम पहले ही यहाँ बोर्ड लगा देता, तो मध्यमवर्गीय परिवार अपनी जीवनभर की गाढ़ी कमाई इन विवादित और खतरनाक प्लॉटों पर नहीं फंसाते। पैसों के लेन-देन के चक्कर में जमीनों का डायवर्शन कर दिया गया और अब जब शहर डूब रहा है, तो बिल्डर और अधिकारी सुरक्षित हैं, जबकि आम जनता और छोटे व्यापारी सड़कों पर आ गए हैं।
निष्कर्ष:
दुर्ग की यह त्रासदी सीधे तौर पर एक ‘मैन-मेड डिजास्टर’ (मानव-निर्मित आपदा) है। जब तक अवैध निर्माणों को संरक्षण देने वाले अधिकारियों और लापरवाह ठेकेदारों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज नहीं होंगे, तब तक दुर्ग की जनता हर बारिश में इसी तरह डूबने को मजबूर रहेगी।
