नई दिल्ली/काशी: सनातन धर्म में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का विशेष महत्व है, जिसे परिवर्तिनी एकादशी, पद्मा एकादशी या पार्श्व एकादशी के नाम से जाना जाता है। 22 सितंबर 2026, मंगलवार को देश भर में यह व्रत बेहद श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। [1, 2, 3]
🛌 इस दिन क्यों करवट लेते हैं भगवान विष्णु?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी के दिन भगवान श्रीहरि विष्णु चार महीने के लिए क्षीर सागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके ठीक दो महीने बाद, भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन भगवान सोते हुए अपनी बाईं करवट से दाईं करवट बदलते हैं। भगवान के शयन में इस स्थान परिवर्तन (बदलाव) के कारण ही इसे ‘परिवर्तिनी एकादशी’ कहा जाता है। इस करवट से ब्रह्मांड में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। [1, 2, 3, 4, 5]
📜 क्या है इसकी पौराणिक व्रत कथा?
शास्त्रों के अनुसार, त्रेतायुग में दानवीर राजा बलि नाम का एक असुर था, जो भगवान विष्णु का परम भक्त था। उसने अपने पराक्रम से तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) पर अधिकार कर लिया, जिससे देवराज इंद्र और अन्य देवता भयभीत हो गए। [1, 2, 3]
देवताओं की पुकार सुनकर भगवान विष्णु ने देवताओं की रक्षा और राजा बलि के अहंकार को शांत करने के लिए वामन अवतार (बौने ब्राह्मण का रूप) धारण किया। वे राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे और दान में तीन पग भूमि मांगी। [1]
- वामन भगवान ने अपने पहले पग में पूरी पृथ्वी और दूसरे पग में आकाश व स्वर्ग लोक को नाप लिया। [1]
- अब तीसरे पग के लिए कोई जगह नहीं बची, तो भक्त राजा बलि ने अपना सिर भगवान के आगे झुका दिया。 [1]
भगवान ने तीसरा पैर बलि के सिर पर रखा, जिससे वह पाताल लोक चले गए। राजा बलि की इस भक्ति और दानवीरता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वे सदैव उनके साथ पाताल लोक में रहेंगे। इसी कारण परिवर्तिनी एकादशी के दिन भगवान का एक रूप पाताल में राजा बलि के पास पहरा देता है और दूसरा क्षीर सागर में शेषनाग पर शयन करता है। [1, 2]
🌟 इस व्रत का महत्व और फल
विष्णु धर्मोत्तर पुराण के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी का व्रत रखने से भक्तों को निम्नलिखित फलों की प्राप्ति होती है: [1]
- वाजपेय यज्ञ का पुण्य: इस दिन सच्चे मन से व्रत और पूजन करने से जातक को महान वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य फल मिलता है।[1]
- पापों से मुक्ति: जाने-अनजाने में किए गए सभी छोटे-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं। [1]
- त्रिदेवों की पूजा का फल: स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था कि इस दिन श्रीहरि की पूजा करने से ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिदेवों) की संयुक्त पूजा का फल मिल जाता है। [1]
- मोक्ष की प्राप्ति: जो भी श्रद्धालु इस दिन उपवास रखकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना करते हैं, उन्हें जीवन में सुख-समृद्धि और अंत में मोक्ष (वैकुण्ठ धाम) की प्राप्ति होती है। [1, 2]
पूजा का शुभ समय: ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस दिन पूजा के लिए विशेष अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11:53 से 12:55 तक रहेगा, जिसमें पीले फल, पीले वस्त्र और पंचामृत का भोग लगाना अत्यंत शुभ फलदायी होगा।
