पश्चिम बंगाल की राजनीति में दशकों बाद एक नया अध्याय शुरू हुआ है। 34 साल के वामपंथी शासन को उखाड़ने वाली ममता बनर्जी की ‘दीदी’ छवि पर भाजपा की संगठनात्मक शक्ति और स्थानीय असंतोष भारी पड़ा है।
भाजपा के आने के प्रमुख कारण
- हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण: भाजपा ने उत्तर बंगाल से लेकर दक्षिण बंगाल तक हिंदू मतदाताओं को एक मजबूत ब्लॉक में संगठित करने में सफलता पाई। संदेशखाली जैसी घटनाओं ने इस ध्रुवीकरण को और हवा दी।
- रोजगार और औद्योगिक विकास का वादा: पिछले 15 वर्षों में राज्य में बड़े उद्योगों की कमी और बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा बनी। भाजपा ने अपने ‘सोनार बांग्ला’ के विजन में उद्योगों की वापसी और युवाओं को नौकरियों का ठोस भरोसा दिया।
- भ्रष्टाचार के विरुद्ध गुस्सा: शिक्षक भर्ती घोटाला और राशन घोटाला जैसे भ्रष्टाचार के आरोपों ने टीएमसी की छवि को नुकसान पहुँचाया। जनता में निचले स्तर के नेताओं (सिंडिकेट) के खिलाफ व्यापक गुस्सा था।
ममता बनर्जी और टीएमसी की बड़ी गलतियां
- अति-आत्मविश्वास और प्रशासनिक विफलता: 15 साल की सत्ता के कारण पैदा हुई ‘एंटी-इन्कंबेंसी’ (सत्ता विरोधी लहर) को टीएमसी भांपने में विफल रही।
- तुष्टिकरण के आरोप: भाजपा ने “अल्पसंख्यक तुष्टिकरण” के दावों को जनता के बीच प्रभावी ढंग से पहुँचाया, जिससे बहुसंख्यक समाज का एक बड़ा हिस्सा टीएमसी से छिटक गया।
- कानून व्यवस्था और महिला सुरक्षा: आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज जैसी घटनाओं और राज्य में बढ़ते अपराधों ने महिला मतदाताओं के बीच टीएमसी की पकड़ कमजोर कर दी, जो कभी उनका सबसे बड़ा समर्थक वर्ग था।
शुभेंदु अधिकारी: भाजपा की जीत के ‘आर्किटेक्ट’
शुभेंदु अधिकारी इस पूरी जीत के केंद्र में रहे हैं। उनकी रणनीति और जमीनी पकड़ ने भाजपा को एक नया आयाम दिया:
- ममता बनर्जी को सीधी चुनौती: नंदीग्राम के बाद अब भवानीपुर में भी ममता बनर्जी को हराकर उन्होंने खुद को बंगाल में भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा साबित किया।
- जमीनी स्तर पर संगठन का विस्तार: टीएमसी के पूर्व सिपहसालार होने के नाते शुभेंदु को उनके दांव-पेच बखूबी पता थे। उन्होंने जंगलमहल और तटीय क्षेत्रों में टीएमसी के नेटवर्क को तोड़कर वहां भाजपा का दबदबा बनाया।
- आक्रामक राजनीति: शुभेंदु ने केंद्रीय नेतृत्व (मोदी-शाह) और राज्य के कार्यकर्ताओं के बीच एक कड़ी का काम किया, जिससे भाजपा चुनाव लड़ने के बजाय ‘जीतने’ की मशीन बन गई।
निष्कर्ष: बंगाल की यह जीत केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं, बल्कि एक वैचारिक बदलाव है। अब भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन चुनावी वादों को पूरा करने की होगी, जिनके दम पर उसने ममता बनर्जी के दुर्ग को ढहाया है।
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